बूंद-बूंद सिंचाई ने किसान की किस्मत बदली, कमाई पहुँची 5 लाख
(सभी तस्वीरें- हलधर)लीलसर, बाड़मेर। बीजीय मसाला और तिलहनी फसलों का रूख करने वाला किसान है टिकमाराम गोदारा। जिन्होंने सिंचाई की आधुनिक तकनीक और उन्नत किस्मों का उपयोग करके अपनी आमदनी बढ़ाने में सफलता पाई है। उनका कहना है कि लाख रूपए के भीतर सिमटी रहने वाली आमदनी अब बढक़र सालाना 4-5 लाख रूपए तक पहुंच चुकी है। किसान टिकमाराम ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास 10 बीघा जमीन है। उन्होंने बताया कि 10वीं पास करने के साथ ही पढ़ाई छोड़ दी। होश संभाला तो अपने को खेतों में पाया। क्योंकि, रोजी-रोटी की तलाश में गांव छोडऩा मैने उचित नहीं समझा। उन्होने बताया कि परम्परागत फसलों का उत्पादन ले रहा हूॅू। लेकिन, आय के आंकड़े में अब फर्क आ चुका है। उन्होंने बताया कि पहले खेती से बरसात कालीन फसल से ही आमदनी मिलती थी। इसके चलते खेती से लाख रूपए की आय भी नहीं मिल पाती थी। बाद में सिंचाई के लिए कुआं खुदवाया। साथ ही, जल बचत के लिए बूंद-बूंद सिंचाई का उपयोग करना शुरू किया। इससे पानी की बचत के साथ-साथ फसल उत्पादन में भी बढौत्तरी देखने को मिली। वहीं, आय का आंकड़ा भी समय के साथ बढ़ता रहा। उन्होंने बताया कि खेती में यह बदलाव कृषि जानकारों के मार्गदर्शन का ही परिणाम है। उन्होंने बताया कि मसालों में जीरा और तिलहन फसल में बूंद-बूंद का उपयोग करते हुए अरंड़ी का उत्पादन ले रहा हॅू। जबकि, खरीफ में बाजरी और मंूग का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलों से सालाना तीन लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है।

उन्नत बीजों से बढ़ी आय
उन्होंने बताया कि जीरा, और अंरड़ी की खेती में पहले से काफी बदलाव किया है। उन्नत बीज उपयोग के साथ बीजोपचार और कतार से कतार, पौधें से पौधें की दूरी और सिंचाई के तौर-तरीकों में बदलाव किया है। इससे सभी फसलों का अच्छा उत्पादन मिल रहा है।
उन्नत पशुपालन
उन्होंने बताया कि पशुधन में मेेरे पास 1 गाय और 3 भैंस है। प्रतिदिन 30 लीटर दुग्ध का उत्पादन हो रहा है। इसमें से एक समय का दुग्ध 60 रूपए प्रति लीटर की दर से बिक्री कर देता हॅू। शेष दुग्ध घर और घी बनाने के काम आ जाता है। उन्होंंने बताया कि पशुपालन से सालाना डेढ़ से दो लाख रूपए की बचत मिल जाती है। वहीं, पशु अपशिष्ट से बायोगैस बना रहा हॅू। इससे ईधन की बचत भी मिल रही है। वहीं, बायोगैस प्लांट के टैंक से निकलने वाली स्लरी खेत में उर्वरक का काम कर रही है।
स्टोरी इनपुट: डॉ. रघुवीर कुमार, डॉ. रावताराम, सहदेव चौधरी, पशुपालन विभाग, बाड़मेर