डेयरी से बदला आर्थिक चक्र, बचत 7 लाख सालाना

नई दिल्ली 13-Dec-2025 12:26 PM

डेयरी से बदला आर्थिक चक्र, बचत 7 लाख सालाना

(सभी तस्वीरें- हलधर)

गोठडा, प्रतापगढ। कहते है कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती है। इस बात को साबित कर दिखाया है किसान नागेश जनवा ने। जो खेत के साथ-साथ डेयरी में पसीना बहा रहे है। परिणाम रहा कि डेयरी से प्रतिमाह 15 हजार रूपए की शुद्ध आय मिल रही है। वहीं, खेती से सालाना 4 से 5 लाख रूपए की बचत हो जाती है। किसान नागेश ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास 13 बीघा जमीन है। उन्होंने बताया कि 12वीं पास करने के साथ ही खेती से जुड़ गया। लेकिन, समय के साथ परिवार के बढते खर्च से पार पाना मुश्किल नजर आने लगा। इस स्थिति को देखते हुए डेयरी को व्यवसाय का रूप दिया। इससे परिवार के आर्थिक हालात पूरी तरह से बदल चुके है। गौरतलब है कि पशुपालक नागेश उत्पादित दुग्ध की बिक्री प्रतापगढ़ में करते है। उन्होने बताया कि गाय का दुग्ध डेयरी बूथ पर दें तो काफी कम भाव मिलते है। जबकि, बाजार में 32 से 35 रूपए प्रति किलो के भाव मिलते है। वहीं, भैंस का दुग्ध 60 रूपए प्रति लीटर की दर से बिक्री कर रहा हॅू। उन्होने बताया कि डेयरी व्यवसाय से परिवार के साथ-साथ पशुधन का खर्च आसानी से निकल जाता है।  उन्होंने बताया कि पहले तो पशुधन का प्रबंधन परम्परागत तौर-तरीकों से करता था। लेकिन, बाद में पशुधन का प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से करने लगा। इससे दुग्ध उत्पादन लागत में कमी आई है। वहीं, दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ पशुधन का स्वास्थ्य भी बेहत्तर बना रहता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में पशुओं की संख्या आधा दर्जन से ज्यादा है। इनमें दुधारू पशुओं में 4 गाय, 1 भैंस शामिल है। जबकि, पशुधन की संख्या 10 के करीब है। इनसे प्रतिदिन 30 किलोग्राम दुग्ध का उत्पादन मिल रहा है। दुग्ध विपणन से मासिक रूप से 15 हजार रूपए की बचत मिल रही है। 

वैज्ञानिक आवास

उन्होंने बताया कि पशुओं की आवास व्यवस्था छायादार वृक्षों के पास की हुई है। तेज गर्मी को देखते हुए संकर गायों के आवास वैज्ञानिक ढग़ से तैयार किए हुए है। यह आवास घर गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म रहता है। जिससे गाये अपने आप को वातानुकूलित महसूस करती हैं, वहीं गर्मी मेँ गायों के दूध उत्पादन पर विपरित प्रभाव नहीं पडता है। उन्होनें बताया कि पशुओं के स्वास्थ्य, डी-वर्मिंग और टीकाकरण के लिए राजकीय पशु चिकित्सालय के चिकित्सक की सेवा लेता हूं।

परम्परागत से लाख

उन्होंने बताया कि परम्परागत फसलों में गेहूं, मक्का, मूंगफली और सोयाबीन की फसल लेता हॅू। इसके अलावा लहसुन, अफीम का उत्पादन लेता हॅू। इसके अलावा मिर्च और टमाटर की खेती करता हॅू। इन फसलों से सालाना 4 से 5 लाख रूपए की आय मिल जाती है।

स्टोरी इनपुट: डॉ. दीपक जैन, केवीके, बडग़ांव, उदयपुर


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नौकरी को बाय-बाय: बीटेक पास उपजा रहा है खरबूज, सकल आय 10 लाख

इंजीनियरिंग करके दो साल के भीतर ही नौकरी को टाटा, बाय-बाय कहने वाला यह किसान है सतीश पवार। जो साल में तीन फसलो का उत्पादन लेकर कृषिगत बचत का आंकड़ा दोगुना कर चुका है। कोटा क्षेत्र में सतीश ने आलू और जायद फसलों के उत्पादन में अलग पहचान बनाई है। सतीश का कहना है कि नौकरी से जरूरतें पूरी होती। कभी, समृद्धि की झलक देखने को नहीं मिल पाती। अब परिवार के साथ रहकर जीवन का असली सावन देख रहा हॅू। उन्होने बताया कि मुझे नई पहचान और कृषि आय को नया फलक देने में कृषि वैज्ञानिको का मार्गदर्शन भी मेरे लिए अमूल्य है। गौरतलब है कि सतीश खरीफ में धान, रबी में आलू और जायद में खरबूज सहित दूसरी सब्जी फसलों का उत्पादन ले रहे है। जिससे सालाना बचत का आंकड़ा 8-10 लाख रूपए तक पहुंच चुका है। मोबाइल 78283-03623