फसल विविधीकरण से सालभर आय, प्रगतिशील किसान बना प्रेरणा स्रोत
(सभी तस्वीरें- हलधर)
पीपल्दाकलां, कोटा। मचान के सहारे शिखर छूने वाले किसान है भगवंत सिंह आसावत, जो फसल विविधीकरण से अपनी आय बढाने में जुटे हुए है। एक्जॉटिक सब्जी फसलों की खेती के साथ-साथ एफपीओं के माध्यम से किसानों की आय बढाने में जुटे है। साथ ही, इनके खेतों में थ्री लेयर तकनीक से फसल का उत्पादन हो रहा है। इससे 365 दिन खेतों से आय मिलती रहती है। गौरतलब है कि किसान भगवंत सिंह सब्जी फसल से 50 हजार रूपए प्रति बीघा और परम्परागत फसलों से 25 हजार रूपए प्रति बीघा का लाभ प्राप्त कर रहे है। किसान भगवंत सिंह ने हलधर टाइम्स को बताया कि संयुक्त परिवार के मध्य 25 एकड़ जमीन है। एलएलबी करने के बाद मुझे लगा कि खेती में कु छ नया करना चाहिए। इसी धुन में नई-नई तकनीक पर फोकस करता रहा। इससे फसल विविधिकरण को बढ़ावा मिला। साथ ही, आमदनी का आंकड़ा भी बढ़ता रहा। बता दें कि हाड़ौती संभाग में किसान भगवंत का खेती साधारण किसान के लिए खेती की पाठशाला से कम नहीं है। क्योंकि, परम्परागत के साथ-साथ आधुनिक कृषि तकनीक का संगम इनके यहां हो चुका है। उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए ट्यूबवैल है और सोलर पंप लगाया हुआ है। परम्परागत फसलों में गेहूं, चना, मेथी, धनिया, अलसी, तारामीरा, सोयाबीन, उड़द, धान और तिल का उत्पादन लेता हॅू। इससे 25 हजार रूपए प्रति बीघा के हिसाब से लाभ मिल जाता है।

उन्होंने बताया कि 4 एकड़ क्षेत्र में परम्परागत और एक्जॉटिक सब्जी फसलों का उत्पादन ले रहा हॅू। एक्जॉटिक सब्जी में लाल मूली, रेड कैबेज, ब्रोकली, लाल-हरी-पीली फूलगोभी, अलग-अलग किस्मों के टमाटर और बेलदार सब्जी फसल शामिल है। उन्होने बताया कि बेल वाली फसलों की खेती मचान विधि से कर रहा हॅू। उन्होंने बताया कि सब्जी फसलों से औसत 50 हजार रूपए बीघा का शुद्ध लाभ मिल जाता है।
लहसुन + गोभी या मटर: लहसुन बुवाई के समय क्यारियों के बीच गोभी या मटर लगाता हॅू। इससे लहसुन के फैलाव अवस्था तक गोभी और मटर की फसल हार्वेस्ट हो जाती है। इसके बाद लहसुन फसल तैयार होने से पूर्व ही प्रो-ट्रे में कद्दू की नर्सरी तैयार रखता हॅू। इससे 20-25 दिन का समय बच जाता है।
उन्होंने बताया कि तार-बांस पद्धति के एक ही ढांचे पर थ्री लेयर फसलों का उत्पादन लेता हॅॅू। नवंबर से मई तक टमाटर, जून से नवंबर तक करेले और दिसम्बर के बाद लौकी, तुरई की फसल लगाता हॅू। जमीन के खाली हिस्से में धनिया, तर-ककड़ी, तरबजू की मिश्रित खेती करता हॅू।
उन्होंने बताया कि थाई अमरूद की सघन बागवानी की हुई है। बगीचा तीन साल का होने को है। लेकिन, दूसरे साल ही आय मिलना शुरू हो गई। पिछले साल 55-60 हजार रूपए प्रति बीघा की आमदनी बगीचे से मिली है।
उन्होने बताया कि पशुधन में मेरे पास 2 भैंस और 1 गाय है। इसेस प्रतिदिन 10-12 लीटर दुग्ध का उत्पादन मिल जाता है। दुग्ध परिवार की आवश्यकता पूर्ति में काम आ जाता है। वहीं, पशु अपशिष्ट से वर्मी खाद तैयार कर रहा हॅॅू। दो वर्मी बेड मेरे पास है। इसके अलावा पशुधन के लिए अजोला यूनिट स्थापित की हुई है।
स्टोरी इनपुट: एनबी मालव, उपनिदेशक, उद्यान, कोटा