खेती की असली वैज्ञानिक महिलाएं: परंपरा, प्रकृति और नवाचार का संगम

नई दिल्ली 01-Jan-2026 03:13 PM

खेती की असली वैज्ञानिक महिलाएं: परंपरा, प्रकृति और नवाचार का संगम

(सभी तस्वीरें- हलधर)

आज जब स्मार्ट खेती की बात होती है, तो इसमें ड्रोन, सैटेलाइट इमेज, सॉइल सेंसर और डेटा ऐनालिटिक्स की बात होती है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि स्मार्टनेस केवल स्क्रीन पर उंगलियां चलाने से नहीं आती। असली स्मार्टनेस तब होती है, जब आप मिट्टी की गंध को पहचान सकें। उसकी विशिष्टताओं और गुणों से परिचित हो सकें। ऐसे ही, बीजों की भाषा को समझ सकें और बारिश से पहले हवा के रुख को पढ़ सकें। यक ीनन, इसकी समझ और संवेदना हमें ऐप्स से नहीं, बल्कि अपनी दादी-नानी से मिली थी। हमने अपने ऐसे अनेक बहुमूल्य और अप्रतिम गुणों को मिट्टी में दबा दिया, जबकि वह जानकारियां और चर्चाएं अभी भी वही है एकदम जीवंत। बस, यह हमारे जागने का इंतज़ार कर रही है। भारत कृषि प्रधान देश है। 

एक लंबा समय ऐसा बीता जब हमने अपनी कृषि परंपरा को बाहरी सलाहों और रासायनिक प्रयोगों के हवाले कर दिया। फसलें बढ़ीं, पर मिट्टी कमज़ोर और बीमार हो गई। उत्पादन बढ़ा, पर आत्मनिर्भरता खो गई। किसान, क्रेडिट कार्ड से कर्जदार हो गया और खेती की जमीन मुनाफे की बजाय बोझ बन गई। यही कारण है कि आज गांव की तस्वीरें हरी कम और चिंतित ज़्यादा हैं। लेकिन, उम्मीद की किरण वहां से फूट रही है, जहां हम अक्सर नहीं देखते गांव की औरतें। वे जो कल तक खेतों के हाशिये पर थीं, लेकिन, वो आज उस बदलाव की अगुवाई कर रही हैं, जिसे हम 'वास्तविक नवाचार कह सकते हैं। भारत में आज प्राकृतिक खेती का एक अभिनव आंदोलन खड़ा हो रहा है और यह कोई शहरी प्रयोगशाला में बना मॉडल नहीं है। यह वही खेती है, जिसमें जीवामृत, बीजामृत, देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से खेतों की उर्वरता बढ़ाई जाती है। यह वह विज्ञान है, जो बिना अंग्रेज़ी के समझ में आता है और बिना लागत के लाभ देता है। यह खेती मिट्टी को पुन: जीवित करती है, किसान को आत्मनिर्भर बनाती है और उपभोक्ता को सुरक्षित भोजन प्रदान करती है।

मध्यप्रदेश में आदिवासी महिलाओं द्वारा जैविक उत्पादों को ब्रांडिंग के साथ बेचना और उन्हें डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर लाना यह दिखाता है कि महिला-किसान अब केवल खेत की मजदूर नहीं, बल्कि एक कुशल उद्यमी भी है। अद्भुत बात यह है कि महिलाएं प्राकृतिक खेती को केवल एक तकनीकी-कार्य नहीं मानतीं। उनके लिए यह एक भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्य है। वे जिस मिट्टी में बीज बोती हैं, उसे मां मानती हैं। वे जानती हैं कि उस मिट्टी पर ज़हर डालना, ख़ुद के घर पर ज़हर डालने जैसा है। यही वह जुड़ाव है, जो आज की खेती में सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। महिलाएं मौसम की भाषा को समझती हैं। उन्हें पता होता है कि हवा में नमी कब बढ़ी कि कौन सा बीज इस साल अच्छा चलेगा और यह भी कि खेत में पांव रखते ही उन्हें मालूम चल जाता है कि अमुक खेत में कौन सी और कैसी समस्या है। यह डेटा किसी सैटेलाइट से नहीं, अनुभव से आता है।

वास्तव में, यही वह अनुभव है जो हमें आज नीति निर्माण में शामिल करना होगा। आज कई महिला स्वयं सहायता समूह न केवल जैविक खेती कर रहे हैं, बल्कि कृषि-उद्यमिता को भी बढ़ावा दे रहे हैं। ये संस्थाएं ब्रांड बना रही हैं, पैकेजिंग कर रही हैं, सोशल मीडिया पर मार्केटिंग कर रही हैं और अपने गांव के अन्य परिवारों को प्रेरित भी कर रही हैं। यह वह 'साइलेंट इनोवेशन है, जिसे हमने लंबे समय तक नजरअंदाज किया। जब जमीनी अनुभवों से जुड़ती है नीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार प्राकृतिक खेती, परंपरागत कृषि ज्ञान और श्रीअन्न (मोटे अनाज) को अपनाने की बात की है। नीति आयोग और कृषि मंत्रालय ने भी इस दिशा में कई योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन इन योजनाओं का असली प्रभाव तभी होगा, जब उन्हें जमीनी अनुभवों और महिला नेतृत्व से जोड़ा जाएगा। देखा जाए तो अभी भी कृषि से जुड़ी ज़्यादातर नीतियां पुरुष-केंद्रित सोच से बनती हैं। जबकि हकीकत यह है कि गांव की महिलाएं खेती का लगभग 60 फीसदी कार्यभार निभाती हैं। इसलिए समझने वाली बात है कि उन्हें सिर्फ 'लाभार्थी मानना एक बहुत बड़ी चूक है। भारत की कृषि को अगर आत्मनिर्भर बनाना है, तो केवल रसायन या तकनीक नहीं, बल्कि उसे संवेदना, परंपरा और महिला शक्ति की भी ज़रूरत है। महिलाएं केवल खेत की ताकत भर नहीं हैं, वे नीति-निर्माण, नवाचार और प्रकृति के साथ जुड़ाव की सबसे बड़ी उम्मीद होती हैं। इसलिए हमें उनकी आवाज़ को मंच देना होगा, उनके अनुभवों को विज्ञान की तरह सम्मान देना होगा और उनकी दृष्टि को नीति की दृष्टि बनाना होगा। अंतत: तभी जाकर भारत की धरती फिर से मुस्कुराएगी- हरी, सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनेगी।


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