खुदवाया फार्मपौंड, उपजाया तरबूज, दोगुना हो गई आय

नई दिल्ली 30-Apr-2024 03:26 PM

खुदवाया फार्मपौंड, उपजाया तरबूज, दोगुना हो गई आय (सभी तस्वीरें- हलधर)

श्रीपुरा, जयपुर। अंधेरों में उजालों की ओर बढऩे का नाम ही जिंदगी है। क्योंकि, दिन के उजालों में जुगनू अपनी पहचान नहीं बना पाते है। अपना हुनर जमाने को दिखाने के लिए उन्हें भी रात का इंतजार करना होता है। खेती के ऐसे ही जुगनू बनकर उभरे है किसान गोपी शर्मा । गोपी जायद के मौसम में तरबूज की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे है। उनका कहना है कि सिंचाई की समस्या के चलते रबी-खरीफ फसलो का उत्पादन कम मिलने लगा था। इस स्थिति में फार्मपौंड खुदवाने के बाद आय बढौत्तरी के लिए तरबूज की खेती को अपनाया। इससे आय का आंकड़ा अब दोगुना हो चुका है। किसान गोपी ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास 12 बीघा पक्की जमीन है। वर्ष 2015 में स्नातक करने के बाद आजीविका के लिए खेती से जुड़ गया। सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन, समय के साथ सिंचाई की मार फसल उत्पादन पर नजर आने लगी। इस स्थिति को देखते हुए फार्मपौंड़ खुदवाया। साथ ही, जायद फसल का उत्पादन लेना शुरू किया। इससे आय का ग्राफ बढ़ाने में मदद मिली है। उन्होने बताया कि सिंचाई के लिए एक ट्यूबवैल मेरे पास है। लेकिन, फार्मपौंड के पानी ने खेती की तस्वीर बदलने का काम किया है। अब रबी और खरीफ फसलों का भी पहले जैसा ही उत्पादन मिलने लगा है। उन्होने बताया कि परम्परागत फसलों में जौ, गेहंू, बाजरा और ग्वार का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलो से सालाना लाख से डेढ़ लाख रूपए कीआमदनी मिल जाती है।

तरबूज से अच्छी आय

उन्होने बताया कि फार्मपौंड खुदवाने के बाद खेतों में अतिरिक्त सिंचाई की व्यवस्था होने से जायद में सब्जी फसलों का उत्पादन लेना शुरू किया। शुरूआत में तो थोड़ा-थोड़ा करके सभी सब्जी फसलों का उत्पादन लेना शुरू किया। लेकिन,  मुनाफा तरबूज की फसल में ज्यादा नजर आया। इस कारण अब तरबूज की खेती का दायरा बढ़ाकर ढ़ाई बीघा कर दिया है। इस फसल से खर्चा निकालने के बाद 45-48 हजार रूपए प्रति बीघा की आमदनी हो जाती है।

उन्नत पशुपालन

पशुधन के रूप में मेरे पास 2 भैंस और 4 हॉलिस्टिन नस्ल की गाय है। भैंस का दुग्ध घर में खाने और घी बनाने के काम आ जाता है। वहीं, 30 लीटर गाय का दुग्ध 30-32 रूपए प्रति लीटर की दर से डेयरी को बिक्री कर देता हॅू। इससे पशुधन के साथ परिवार का दैनिक खर्च निकल जाता है। वहीं, पशु अपशिष्ट से कम्पोस्ट खाद तैयार करके उपयोग कर रहा हॅू।


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कहते है कि परिवार के आर्थिक हालात ठीक नही हो तो सफलता के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। किसान औंकारमल मेघवाल के साथ भी यही हुआ है। औंकार ने बताया कि पहले खेतों से पैदावार कम मिलती थी। इससे परिवार का खर्च निकालना भी मुश्किल लगता था। मजबूरी में रोटी-रोटी की तलाश ने मुझे दुबई पहुंचा दिया। आठ साल में जो कमाया, यहां लौटकर खेतों में निवेश किया। इसी का परिणाम है कि अब खेतों से 10-12 लाख रूपए सालाना की आमदनी मिल रही है। गौरतलब है कि किसान औकारमल डेढ़ दशक से सब्जी फसलो की खेती कर रहे है। साथ ही, इन्होने प्रति बीघा परम्परागत फसलों का उत्पादन बढ़ाने में भी सफलता पाई है। मोबाइल 9983231901