सूरन की पहुंच सिर्फ 3 जिलों तक सीमित: क्या है वजह?

नई दिल्ली 06-Nov-2025 03:25 PM

सूरन की पहुंच सिर्फ 3 जिलों तक सीमित: क्या है वजह?

(सभी तस्वीरें- हलधर)

सरकार की अदूरदर्शिता से पिछड़ी ही रह गई वनवासियों की सब्जी फसल
पीयूष शर्मा

जयपुर। प्रदेश के साथ-साथ देश दुनिया को उर्जा फसल देने वाले मेवाड़ संभाग में एक ऐसी फसल भी पैदा हो रही है। जिसे आधे से ज्यादा राजस्थान ने ना खाया होगा, ना ही देखा होगा और ना नाम सुना होगा। क्योंकि, हरित क्रांति के बाद गेहूं-चावल सहित दूसरी फसलों का उत्पादन बढाने पर जोर दिया गया। लेकिन, कंदीय फसल यानी वनवासियों की सब्जी फसल को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। शायद यही कारण है कि राजस्थान में पैदा होने के बावजूद भी इसका नाम, स्वाद और खेती का दायरा तीन जिलों से आगे नहीं निकल पाया। दरअसल, यहां हम बात कर रहे है सूरण की। जिसे वनवासियों की सब्जी फसल कहा जाता है। बड़ी बात यह है कि इस कंदीय फसल का जितना बीज जमीन में डालोगें, उसका 15 गुणा तक उत्पादन मिलता है। इसके बावजूद भी यह फसल प्रदेश में आदिवासियों के जैसे ही पिछड़ी की पिछड़ी रह गई। हालांकि, इस फसल को किसानों के लिए लाभकारी बनाने के लिए महाराणा प्रताप कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में शोध कार्य चल रहा है। लेकिन, इस दिशा में राज्य सरकार को भी ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि, यह फसल भी मथानिया मिर्च के जैसे इतिहास बनने के कगार पर पहुंच चुकी है। गौरतलब है कि डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर जिले को मिलाकर सूरण की खेती महज 110 हैक्टयर क्षेत्र में हो रही है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सूरण भी मानव के लिए उर्जा फसल है। कई पोषक तत्वों से भरपूर ही इस फसल पर शोध कार्य चल रहा है। ताकि, स्थानीय जलवायु में तैयार होने वाली किस्म का विकास किया जा सके। गौरतलब है कि आजादी से अब तक इस फसल की एक नई प्रजाति का विकास हो पाया। इससे कंदीय फसलों पर सरकार और वैज्ञानिकों की कृपा दृष्टि का अंदाजा लगाया जा सकता है। जबकि, यह फसल कुपोषण से सुपोषण की ओर ले जाने और किसान की आय बढाने का मादा रखती है। एमपीयूएटी में कंदीय फसल अनुसंधान परियोजना के प्रभारी डॉ. विरेन्द्र सिंह ने बताया कि सुरण का वानस्पतिक नाम अमोर्फोफेलस पेओनिफोलियस और फैमली-एरेसी है। इसे आम भाषा में एलिफेंट फुट भी कहा जाता है। उन्होने बताया कि विश्वविद्यालय में वर्ष 2015 से कंदीय फसलों पर अनुसंधान कार्य चल रहा है। इन फसलों में सूरण के साथ-साथ अरबी, शकरकंद, रतालू शामिल है। उन्होंने बताया कि रतालू की खेती से काफी किसान मेवाड़ संभाग में जुड़ चुके है। लेकिन, सुरण का उत्पादन अब भी काफी सीमित है। जबकि, सुरण पोषक और औषधीय गुण का खजाना है। 


पोषक और औषणीय गुण
उन्होंने बताया कि सूरण कार्बोहाइड्रेट के साथ-साथ विटामीन ए, बी और लवणों से भरपूर जमीकंद है। साथ ही, इसके घनकंदों का उपयोग सब्जी, भर्ता, पापड़, नूडल्स, चिप्स, आचार सहित कई दूसरे व्यंजन बनाने में किया जाता रहा है। उन्होने बताया कि सूरण की सब्जी घी में तैयार होती है और इसकी सब्जी 15-20 दिन तक खराब नहीं होती है। इस गुण के चलते सूरण आदिवासियों की पसंद शुरू से रहा है। इसके अलावा इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधी तैयार करने में भी किया जाता है। 


ऐसी बढ़ाएं आमदनी
उन्होंने बताया कि इस जमीकंद से किसान दोहरा मुनाफा ले सकते है। खेती की मेढ़ पर अप्रैल से जून महीने के दौरान इसकी बुवाई की जा सकती है। उन्होने बताया कि सूरण के साथ-साथ अरबी, शकरकंद और रतालू ऐसी फसल है, जिनसे 15 गुणा तक उपज मिलती है। उदाहरण के तौर पर सूरण को ही ले, एक हैक्टयर क्षेत्र में 25-30 क्विंटल बीज की जरूरत होती है। जबकि, उत्पादन 25-30 टन प्रति हैक्टयर तक मिलता है। जबकि, रिटेल में यह जमीकंद 100 रूपए प्रति किलो से अधिक के भाव पर बिक्री होती है। 
कैल्शियम ऑक्सीलेट थी समस्या
विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. अरविंद वर्मा ने बताया कि रक्तशोधक, कब्ज, बवासीर, दमा, दस्त और पेट विकार में उपयोगी सूरण की खेती को बढ़ावा नहीं मिलने के पीछे एक कारण इसमें कैल्शियम आक्सीलेट की ज्यादा मात्रा होना है। इस तत्व के कारण कंद के सेवन से मुंह, जीभ और गले में तीक्ष्ण खुजली और चरपराहट पैदा होती थी। लेकिन, अब सूरण की गजेन्द्र नामक  प्रजाति का विकास हो चुका है। जिसमें कैल्शियम आक्सीलेट तत्व की मात्रा घटा दी गई है। ऐसे में मेवाड़ संभाग के किसानों के लिए यह फसली मुनाफेकारी साबित हो सकती है। गौरतलब है कि सूरण के साथ-साथ सभी कंदीय फसलों के लिए उष्ण जलवायु की आवश्कता होती है। 
फसल     क्षेत्रफल है.     उत्पादन प्रति है.
शकरकंद    693         20-25 टन
अरबी    370         15 टन
रतालू    1120         25-35 टन
सुरण    110        25-30 ट

खेत से बिक रही है रतालू
उन्होने बताया कि रतालू की खेती से राजसमंद सहित कई गांवों को नई पहचान मिली है। रेलमगरा क्षेत्र के सकरावास, माउड़ा, मदरा, बैखुंड़ी, बामनिया, राजसमंद सहित दर्जनों गांव ऐसे है, जिसमें रतालू की बडे पैमाने पर खेती होने लगी है। यहां करीब 300-400 हैक्टयर क्षेत्र में किसान रतालू का उत्पादन ले रहे है। क्योंकि, यह फसल खेत से ही बिक्री हो जाती है। उन्होने बताया कि फसल तैयार होने से पूर्व ही मध्यप्रदेश के ठेकेदार खेत में खड़ी फसल की खरीद कर लेते है। इससे किसानों को भी फायदा मिल रहा है। 

सूरण का दायरा बढाने के लिए विश्वविद्यालय एक्रिप परियोजना के तहत प्रयास करेगा। मेवाड़ संभाग के किसानों को सुरण की उन्नत किस्म का बीज मुहैया करवाया जायेगा। कंदीय फसलो की खेती किसानो के लिए लाभकारी है। 
डॉ. प्रताप सिंह, कुलपति, एमपीयूएटी


ट्रेंडिंग ख़बरें