खेजड़ी कटाई का कहर:संकट में किसान, पशुधन और थार

नई दिल्ली 09-Feb-2026 05:15 PM

खेजड़ी कटाई का कहर:संकट में किसान, पशुधन और थार

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जल-जीवन के साथ चारे, ओरण, जैवविविधता का भी सवाल
पीयूष शर्मा

जयपुर। 26 लाख खेजड़ी की कटाई के आंकडो में थोड़ी भी सच्चाई है तो ये थार की जैव विविधता, किसान-पशुधन, वैज्ञानिक रिसर्च और मरूस्थली रोकने के प्रयासों को बड़ा झटका तो है ही। वहीं, थार के वाशिन्दों के लिए मेगावाट के पैमाने से एक बडे संकट की धीमी आहट भी है। जिसको पर्यावरण प्रेमी तो पहचान रहे है। लेकिन, सरकार अभी आश्वासनों से संरक्षण की कवायद में जुटी है। कृषि-पर्यावरण विशेषज्ञों की माने तो पश्चिमी जिलों में स्थापित हो रहे सौर उर्जा पार्क थार को फिर से तपिस्थान बनाकर रख देंगे। साथ ही, लाखों करोड़ो रूपए का नुकसान भी देंगे। हालात ऐसे ही बने रहे तो जिस निवेश के पीछे सरकार दौड़ रही, थार को फिर संवारने में इससे चौगुना राशि खर्च करने की नौबत आ खड़ी होगी। बता दें कि सौलर पैनल से स्थानीय तापमान में 3-4 डिग्री सेल्सियस की बढौत्तरी होती है। ऐेसे में निकट भविष्य में थार में जीवन निर्वाह और खेती-किसानी का परिदृश्य कैसा होगा? कल्पना से परे की बात हो सकती है। क्योंकि, जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जैव विविधता से छेड़छाड़ बड़े नुकसान का संकेत है। गौरतलब है कि मई-जून के महीने में पश्चिमी जिलों का तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे में सौर उर्जा का विकास भविष्य में विनाश का पर्याय बनकर सामने आयेगा, यह बात कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। खेजड़ी कटाई रोकने के लिए जिस तरह से सांधु संतों, बिश्रोई समाज के साथ 36 कौम के लोग अन्न-जल त्यागकर लामबद्ध हुए है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि थार की जीवनरेखा खेजड़ी की किस पैमाने पर कटाई हो रही है। त्रिकालदर्शी खेजड़ी को राज्य वृक्ष का दर्जा मिले चार दशक से अधिक का समय हो चुका है। लेकिन, सरकार ने इसके संरक्षण और संवद्र्धन पर ध्यान नहीं दिया। ध्यान दिया होता तो शासन-प्रशासन को जनमानस से आंदोलन खत्म करने की मिन्नतें नहीं करनी पड़ती। यह स्थिति तब है जब खेजड़ी से मिलने वाली सांगरी को जीआई टैग दिलाने की कवायद हो रही है। बता दें कि बीकानेर आंदोलन की गूंज दिल्ली दरबार तक उठ चुकी है।

2.60 हजार करोड़ का नुकसान

26 लाख खेजड़ी पेड़ काटे जाने से किसानों को क्या नुकसान हुआ है, इसका अंदाजा किसी को नहीं है। केन्द्रीय शुष्क  बागवानी अनुसंधान संस्थान, बीकानेर के अध्ययन के मुताबिक खेजड़ी के एक व्यस्क पेड़ से औसत 14-15 किलोग्राम तक सांगरी का उत्पादन मिलता है। बाजार में इसकी कीमत हजार में होती है। लेकिन, किसान को औसत एक पेड़ से 800 रूपए की आय सांगरी से मिल जाती है। इस हिसाब से 3.25 लाख क्विंटल सालाना सांगरी उत्पादन पर कुल्हाड़ी चल चुकी है। आर्थिक रूप से देंखे तो 2 लाख 60 हजारा करोड़ का नुकसान किसानों को हो चुका है। 

सांसो पर खड़ा होगा संकट

आर्थिक और जैव विविधता नुकसान के साथ-साथ थार में सांसो का संकट भी खड़ा होता नजर आ रहा है। वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक खेजड़ी का एक पेड़ सालाना 10 से 40 किलोग्राम तक कार्बनडाई ऑक्साइड़ अवशोषित करता है। बदले में प्राण वायु यानी ऑक्सीजन देता है। ऐसे में थार में भविष्य के जीवन का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है। 

पोषण का भी खात्मा

खेजड़ी को थार का कल्पवृक्ष ही नहीं, मानव-पशुधन के लिए सुपोषण का सस्ता साधन भी माना गया है। प्रति 100 ग्राम सांगरी के पोषक मूल्य पर गौर करें तो नमी 6.7 प्रतिशत, प्रोटीन 17.1 प्रतिशत, वसा1.7 प्रतिशत, राख 4.5 प्रतिशत, रेंशे 22.5 प्रतिशत और 47.5 फीसदी कार्बोहाइडे्रट मिलता है। 

बढेगा जल दोहन

जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से देखें तो थार मरुस्थल में पानी की एक-एक बूंद स्वर्ण के समान है। लेकिन, एक विशाल सौर परियोजना को सुचारु रखने के लिए पैनलों की सफाई के लिए प्रति सप्ताह लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यह पानी उसी भूजल स्रोत से खींचा जा रहा है, जो स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों की जीवनरेखा है। जब ओरण की जमीन पर कंक्रीट के ढांचे और पैनल बिछ जाते हैं, तो वर्षा जल के संचयन की प्राकृतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है।

वनस्पतियों का विनाश

प्रदेश में लगभग 25,000 ओरण हैं, जो करीब 6 लाख हैक्टयर भूमि पर फैले हैं। यह क्षेत्र न केवल दुर्लभ वनस्पतियों के घर हैं। बल्कि, लुप्तप्राय जीवों के लिए अंतिम शरणस्थली भी हैं। यहां की जैव-विविधता अन्य मरुस्थलीय क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है, जो पूरे क्षेत्र के सूक्ष्म-जलवायु को नियंत्रित करती है। किसान बताते है कि पहले बेटी का रिश्ता खेतों मे खेजड़ी के पेड़ो के आधार पर तय होता रहा है। लेकिन, अब खेजड़ी की किसी को परवाह नहीं रही है। 

रिसर्च बेकार जाने का अंदेशा

थार मरुस्थल में मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ओरण और खेजड़ी का विनाश इसी गति से जारी रहा, तो धूल भरी आंधियों की तीव्रता उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, यहां तक कि दिल्ली-एनसीआर तक, कई गुना बढ़ जाएगी। ओरण की घास और पेड़ों की कमी का सीधा अर्थ है- रेत का अनियंत्रित प्रसार। यानी थार को बांधने के लिए अब तक जो वैज्ञानिक  रिसर्च हुए है, जो मॉडल विकसित किए है, उनका भी रेत में समाना तय है। गौरतलब है कि खेजड़ी की जड़ें जमीन के 30 मीटर नीचे तक जाकर मिट्टी को थामे रखती हैं और धूल भरी आंधियों की गति को नियंत्रित करती हैं।


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