प्याज-लहसुन फेंकने को मजबूर किसान, सरकार पर सौतेलापन का आरोप

नई दिल्ली 07-Nov-2025 11:49 AM

प्याज-लहसुन फेंकने को मजबूर किसान, सरकार पर सौतेलापन का आरोप

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जयपुर। इस साल लहसुन और प्याज की फसल ने किसानों के आंसू निकाल दिए है। हालात ये है कि किसान लागत नहीं निकलने के चलते प्याज की फसल को फेकनें लगे है। वहीं, बाजरा उत्पादक किसानों को सरकारी दगा जैसी स्थिति से दोचार होना पड़ रहा है। गौरतलब है कि इस साल बाजार का असर लहसुन-प्याज के रकबे पर पडऩा तय है। कृषि जानकारों का कहना है कि बाजार किसानों के साथ नहीं है। ऐसे में अतिवृष्टि से प्रभावित किसान लहसुन-प्याज से स्वत: ही तौबा करता नजर आ रहा है। इसके कारण रबी में प्याज और लहसुन के रकबा काफी घट सकता है। बता दें कि मोंथा चक्रवात के कारण प्रदेश में तीन दिन चले बारिश के दौर से लहसुन का बीज बेकार हो गया है। इससे भी किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। किसानों का कहना है कि अब दोबारा लहसुन बुवाई की हिम्मत शेष नहीं रही है। खेत तैयार होने पर गेहूं की बुवाई कर देंगे। क्योंकि, अब रामजी किसानों के साथ नहीं रहा है। किसानों को औसतन 2 से 5 रूपए प्रतिकिलो के भाव मिल रहे है। इससे लहसुन उत्पादकों की फसल लागत भी नहीं निकल पा रही है। सूत्रों ने बताया कि इस वर्ष लहसुन का बुवाई क्षेत्र जौ, चना और गेहूं की फसल में तब्दील होने की पूरी संभावना है। गौरतलब है कि हाड़ौती संभाग में पहले अतिवृष्टि और अब इन दिनों हो रही बरसात से खरीफ फसलों को खास नुकसान पहुंचा है। इस कारण किसान अब लहसुन पर दांव खेलने की स्थिति में नहीं है। उल्लेखनीय है कि हाड़ौती संभाग में हर साल सवा से डेढ़ लाख हैक्टयर क्षेत्र में किसान लहसुन की बुवाई करते है। सूत्रों ने बताया कि लहसुन के औने-पौने दामों का असर राजस्थान हीं नहीं, मध्यप्रदेश और गुजरात में भी देखने को मिल रहा है।


किराया भी नहीं निकला
लहसुन-प्याज के भावों का आलम यह है कि अभी मंडियों में ले जाकर बेचने का किराया भी नहीं निकल रहा। ऐसे में उनके सामने इसे फेंकने के सिवा कोई उपाय नहीं है। कृषि उपज मंडियों में लहसुन के दामों में फिलहाल सुधार की कोई उम्मीद नहीं है। ऐसे में मजबूरन किसान लहसुन बुवाई से तौबा करेंगे। इस कारण लहसुन बुवाई के रकबे में 40-45 फीसदी तक गिरावट देखने को मिल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसान लाभ के लिए गेहूं, चना जैसी फसल का रूख कर सकते है।


बाजरा-मक्का का वादा अधूरा
ेप्रदेश के बाजरा-मक्का उत्पादक किसानों की सुनवाई नहीं हो रही है। किसान बाजार में बेजार होने को मजबूर है। सरकार ने दोनों फसलों का समर्थन मूल्य तो घोषित कर दिया है। लेकिन, सरकारी खरीद का कोई इंतजाम नहीं किया है। इसके चलते किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। गौरतलब है कि मक्का और बाजरे के बाजार भाव इस वर्ष के लिए घोषित एमएसपी से तकरीबन 600-800 रूपए नीचे चल रहे है। इसके चलते किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि मक्का और बाजरे के मौजूदा बाजार भाव से खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। किसान महापंचायत ने इसे किसानों का शोषण बताते हुए मक्का और बाजरे की सरकारी खरीद शुरू करने की मांग केन्द्र और राज्य सरकार से की है। 


किसान क्यों उपजायेगा प्याज
सरकार के आकलन के अनुसार 1 किलो प्याज की उत्पादन लागत 8 से लेकर 10 रुपए प्रति किलो है और उत्पादक किसानों के अनुसार यह 18-20 रूपये प्रति किलो है। जबकि किसानों को खैरथल मंडी में 1 किलो प्याज 5 रुपए में बेचने को विवश होना पड रहा है। कमोबेश यही हाल मक्का, उड़द, मूंगफली, मूंग, बाजरा, सोयाबीन, कपास जैसी उपजों का है। किसान एमएसपी से कम दामों पर उपज बेचने को विवश है। इससे एक क्विंटल पर 3000 रुपए तक का घाटा उठाना पड़ रहा है। जबकि, सरकार ने एमएसपी पर बाजरे की खरीद का वादा किसानों से किया था। 
रामपाल जाट, राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान महापंचायत


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