कृषि पराशर ग्रंथ: श्रावण वर्षा, रोहिणी नक्षत्र और प्राचीन वर्षा संकेत

नई दिल्ली 31-Dec-2025 06:14 PM

कृषि पराशर ग्रंथ: श्रावण वर्षा, रोहिणी नक्षत्र और प्राचीन वर्षा संकेत

(सभी तस्वीरें- हलधर)

कृषि पराशर: एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ है, जिसकी रचना सदियों पहले पराशर ऋषि ने की थी। ऋषि पराशर ने इसमें कृषि के विभिन्न प्रकार, विकास, वृष्टि (बारिश), वर्षा, विभिन्न ऋतुओं के लक्षण और धान्य के विकास को अपने विचारों के जरिए गहनता से समझाया है। धर्म-ग्रंथों में कृषि का बड़ा महत्व बताया गया है। यहां तक कि कृषि कर्म में किसान अपने दोषों से भी मुक्त हो जाता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने कृषि को पवित्र कर्म माना है और कृषि का महत्व समझाया है।

12. श्रावणवृष्टिलक्षणम् (श्रावण की वर्षा का लक्षण)

  • श्लोक: रोहिण्यां श्रावणे मासि यदि वर्षति वासवः। तदा वृष्टिर्भवेत्तावद् यावत्प्रोत्तिष्ठते हरिः॥

    • अर्थ: यदि इन्द्र श्रावण मास की रोहिणी को बरसता है तो आगे तब तक वर्षा होगी जब तक कि भगवान विष्णु के शयन से उठने का समय अर्थात् कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवोत्थान एकादशी न हो जाय।

  • श्लोक: कर्कटे रोहिणीऋक्षे यदि वृष्टिर्न जायते। तदा पराशरः प्राह हा हा लोकस्य का गतिः॥

    • अर्थ: अर्थात् सूर्य कर्क राशि पर स्थित हो और रोहिणी नक्षत्र में वर्षा न हो तो पराशर मुनि दुःख प्रकट करते हैं कि ऐसी स्थिति में मनुष्यों की क्या दशा (गति) होगी।

  • श्लोक: श्रावणे मासि रोहिण्यां न भवेद्वर्षणं यदि। विफलारम्भसंक्लेशास्तदा स्युः कृषिवृत्तयः॥

    • अर्थ: अर्थात् यदि श्रावण मास के रोहिणी नक्षत्र में वर्षा न हो तो कृषकों को कृषिकर्म विफल होने से महान क्लेश हो। 

13. सद्योवृष्टिज्ञानम् (तुरन्त वर्षा होने का लक्षण)

  • श्लोक: जलस्थो जलहस्तो वा निकटेथ जलस्य वा। स्प्रष्टा पृच्छति सुष्ट्वर्थ वृष्टिः संजायतेऽचिरात्॥

    • अर्थ: अर्थात् यदि जल के बीच से या उसके आसपास जल का फुहारा फूटे तो ब्रह्माजी कहते हैं कि सृष्टि की रक्षा के लिए अब अविलम्ब वर्षा होगी।

  • श्लोक: उत्तिष्ठत्यण्डमादाय यदा चैव पिपीलिका। भेकः शब्दायतेकस्मात् तदा वृष्टिर्भवेद्ध्रुवम्॥

    • अर्थ: अर्थात् चींटियां जब अपने अंडों को लेकर बिल से निकल पड़ें और मेंढक एकाएक टर्र-टर्र करने लगें तो निश्चित रूप से तुरन्त वर्षा होगी।

  • श्लोक: विडाला नकुलाः सर्पा ये चान्ये वा बिलेशयाः। धावन्ति शलभा मत्ताः सद्योवृष्टिर्भवेत् ध्रुवम्॥

    • अर्थ: अर्थात् बिल्लियां, नेवले, सांप तथा बिलों में रहने वाले अन्य जन्तु तथा पतंगे जब मत्त (घबराये हुए) हों या भागने लगें तो निश्चित है कि वर्षा तुरन्त होगी।

  • श्लोक: कुर्वन्ति बालका मार्गे धूलिभिः सेतुबन्धनम्। मयूराश्चैव नृत्यन्ति सद्योवृष्टिर्भवेद् ध्रुवम्॥

    • अर्थ: जब बालक खेलते हुए रास्ते पर धूलि से पुल बांधते हैं और मोर नाचते हैं तब ध्रुव है कि वर्षा तुरन्त होगी।

  • श्लोक: आधातवातदुष्टानां नृणामंगे व्यथा यदि। वृक्षाग्रारोहणं चाहेः सद्योवर्षलक्षणम्॥

    • अर्थ: अर्थात् दूषित वायु के शरीर पर आघात से जब लोगों के शरीर में दर्द होने लगे, सर्प पेड़ों के सिरों पर चढ़ने लगें तो यह तत्काल वर्षा का लक्षण है।

  • श्लोक: पक्षयोः शोषणं रौद्रे खगानामम्बुचारिणाम्। झिञ्झीरदस्त्वकाशासे सद्यो वर्षणलक्षणम्॥

    • अर्थ: अर्थात् जलचर पक्षीगण जब अपने पंखों को सूर्य की धूप में सुखाते हुए दिखाई दें और आकाश में झिझियों का रव (ध्वनि) सुनाई दे तो तुरन्त वर्षा का लक्षण है।

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