मानव और पशुओं के लिए अमृत है फोग, लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता..

नई दिल्ली 23-Mar-2026 06:05 PM

मानव और पशुओं के लिए अमृत है फोग, लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता..

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा

जयपुर। राजस्थान को छोडक़र देश के सभी दूसरे राज्यों में फॉग सर्दी में ही चलता है। लेकिन, यहां 12 महीने फोग चलता है। थार ये फोग किसी वंडऱ से कम नहीं है। क्योंकि , इसकी तीन-चार कोपल चूसकर प्यास बुझाई जा सकती है। वहीं, रायता में इसका जायका लाजबाब होता है। बात करे इसकी न्यूट्रिशनल वैल्यू की तो इससे मिलने वाला फोगला बाजार में 2 हजार रूपए प्रति किलो के भाव से बिक्री होता है। दरअसल, यह फोग वो नहीं, जो आप समझ रहे है। हम बात कर रहे है कैलगोनम पॉलीगोनोइड्स, जो एक रेगिस्तानी पौधा है, जिसे फोग कहा जाता है। यह पौधा अपने औषधीय गुणों के चलते शुष्क-अद्र्धशुष्क बागवानी में इसकी अलग पहचान है। बागवानी वैज्ञानिकों का कहना है कि  थार की जैव सम्पदा में शामिल यह पौधा कई पशु-पक्षियों का बसेरा है। साथ ही, मार्च से नवम्बर तक हरे पोषक चारे का विकल्प भी। उन्होंने बताया कि यह फोग थार के राहगीरों का सच्चा हमसफर भी है। क्योंकि, इसकी तीन चार कोपल को मुंह में रखने मात्र से ही कंठ सूखना यानी प्यास लगना बंद हो जाता है। बड़ी बात यह है कि इसका कोई साइड इफैक्ट भी नहीं है। लेकिन, सरकार और वन विभाग की उदासीनता के चलते खेजड़ी के जैसे ही इसका संरक्षण और संवद्र्धन भी जरूरी हो गया है। क्योंकि, इस पौधें की लम्बाई एक मीटर से ज्यादा नहीं होती है। पशुपालक, इसके फलने-फूलने के साथ ही छंगाई कर लेते है। इस कारण मरूधरा की इस सम्पदा का दायरा भी तेजी से सिमट रहा है। वैज्ञानिकों ने बताया कि बीकानेर, जोधपुर, चुरू, बाड़मेर, जैसलमेर जिले में ही इस पौधें का जीवन शेष रहा है। जबकि, शेष सभी दूसरे जिलों में समय के साथ फोग पौधा नजरों से ओझल हो चुका है। उल्लेखनीय है कि शुष्क बगवानी को प्रोत्साहित करने के लिए केन्द्रीय शुष्क बागवानी अनुसंधान संस्थान, बीकानेर के द्वारा फोग पर शोध किया जा रहा है। ताकि, पश्चिमी राजस्थान के किसानों की आय को बढ़ाया जा सके। इसके लिए संस्थान ने फोग की उन्नत किस्म सीआईएएच-फोग-1 विकसित की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खेजड़ी + झरबेर + फोग का मिश्रित रोपण मॉडल(2500 पौधे प्रति है.)टीलों वाले इलाकों में साल भर हरियाली विकसित करने के लिए बहुत उपयोगी है।

क्या है फोग

फोग पॉलीगोनेसी परिवार का पौधा है। यह रेत के टीलों वाले इकोसिस्टम में पाया जाने वाला एक बारहमासी झाड़ीदार पौधा है, जो सूखे और अन्य अजैविक दबावों  को सहने की क्षमता रखता है। यह अपनी ऊर्जा से भरपूर जलाऊ लकड़ी, पत्तियों से बने चारे और फूलों की कलियों के लिए मशहूर है। यह भारत के गर्म और शुष्क क्षेत्रों में तेजी से विलुप्त हो रहा पौधा है। 

मिलता है लास्सू

यह गर्मियों में हरा-भरा रहता है और सबसे गर्म समय के दौरान स्थानीय निवासियों को विशेष हरियाली और भोजन सुनिश्चित करता है। इसकी पत्तियों से बने चारे को लास्सू कहा जाता है। यह चारा पोषक तत्वों से भरपूर होता है और रेगिस्तान के छोटे जानवरों द्वारा बहुत पसंद किया जाता है।

बहुत छोटे होते है बीज

फोग के फाइलोक्लेड पर लगने वाले फलों में केवल एक ही बीज होता है। इसके बीज बहुत छोटे होते हैं। बीज की लंबाई 0.194 से 0.286 एमएम (औसतन 0.223 एमएम) और चौड़ाई 0.078 से 0.116 एमएम(औसतन 0.099 एमएम) के बीच होती है। एक बीज का वजन 0.006 से 0.015 ग्राम के बीच होता है। जबकि, 100 बीजों का कुल वजन 1.26 ग्राम (जो 0.63 से 1.58 ग्राम के बीच) होता है।

2 हजार प्रति किलो फोगला

इसकी अधखिली कलियों को तोड़ लिया जाता है। ये एंटी-ऑक्सीडेंट और सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध होती हैं। सथ ही,  इनमें गर्मी प्रतिरोधी और स्वास्थ्यवर्धक गुण पाए जाते हैं। इन कलियों को फोगला कहा जाता है। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डीके समादिया की माने तो बाजार में फोगला 2 हजार रूपए प्रति किलो के भाव से बिक्री होता है। विशेष रूप से फोगले का उपयोग रायता में होता है। एक पौधे से 600 से 1000 किलोग्राम तक फोगला मिलता है। फोगला में कार्बोहाइड्रेट (57.41 प्रतिशत), प्रोटीन (18.4प्रतिशत), फैट (5.81प्रतिशत), कच्चा फाइबर (15.73प्रतिशत), सीए (2.11प्रतिशत), पी (0.42प्रतिशत), और ट्रेस एलिमेंट (1.3 प्रतिशत) होता हैं। 

चारे में पोषकता

इसके हरे पत्तों में (सूखे वजन के आधार पर) कार्बोहाइड्रेट (55.84 प्रतिशत), प्रोटीन (6.05 प्रतिशत), फैट (0.97 प्रतिशत), कच्चा फाइबर (21.03प्रतिशत), सीए (0.67 प्रतिशत), के (2.43 प्रतिशत), पी (0.42प्रतिशत) और ट्रेस एलिमेंट (13.58 प्रतिशत) होते हैं। उन्होंने बताया कि इसके ताज़े तोड़े गए बीजों में 72-78 प्रतिशत अंकुरण होता है। 40-45 दिन पुराने पौधे लगाने के लिए सही होते हैं, खासकर अगस्त में। नर्सरी में उगाए गए पौधे 65 प्रतिशत तक जिंदा रहते हैं। उन्होने बताया कि पहले 24 महीनों में सही मैनेजमेंट से पौधे का तेजी से विकास होता है। मई-जून में ट्रेनिंग-प्रूनिंग और नवंबर में कटाई से बायोमास की ज़्यादा से ज़्यादा पैदावार होती है। कमर्शियल कटाई 6-7 साल में शुरू होती है, जिससे हर पौधे से हर साल औसतन 14.85 केजी उत्पादन मिलता है। बारिश और कम तापमान वाले हालात में फोग के पौधे दिसंबर में पत्ते गिरा देते हैं, बसंत में फिर से उगते हैं और गर्मियों में खूब बढ़ते हैं और फूल खिलते हैं। इसलिए मार्च से अप्रैल की शुरुआत तक कटाई सबसे अच्छी होती है, जिससे 0.725 केजी प्रति पौधा मिलता है। 

संरक्षण आवश्यक

बदलते समय में प्राकृतिक भूमि कम होने और अनियंत्रित कटाई के कारण इन पेड़-पौधों की संख्या तेजी से घट रही है। यदि समय रहते संरक्षण और संवर्धन की ठोस योजना नहीं बनाई गई, तो भविष्य में कैर, बेर, फोग और खैर केवल यादों तक सीमित रह जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि वन और कृषि विभाग यदि इन प्रजातियों को संरक्षण देकर बागवानी में शामिल करें और स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाएं, तो यह प्राकृतिक विरासत बचाने के साथ-साथ ग्रामीणों के लिए स्थायी रोजगार का माध्यम भी बन सकती है।


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