नागौरी अश्वगंधा अब ग्लोबल कमोडिटी में
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। बुढ़ापे को दूर रखने वाली असगंध यानी अश्वगंधा अब ग्लोबल कमोडिटी में शामिल हो चुकी है। हाल ही, इस फसल को नागौरी अश्वगंधा के नाम से जीआई टैग प्राप्त हुआ है। गौरतलब है कि अश्वगंधा को जीआई टैग (भौगोलिग संकेतक) दिलाने में आईसीएआर-औषधीय एवं सुगंधित पादप अनुसंधान निदेशालय, बोरियावी (आनंद-गुजरात) के कृषि वैज्ञानिकों ने महत्ती भूमिका निभाई है। देश-दुनिया को सेहत का वरदान देने वाली अश्वगंधा के प्रदेश में हालात तो अपने घर में बेगाना जैसे है। क्योंकि, पांच कृषि विश्वविद्यालय होने के बावजूद भी इस फसल पर अब तक रिसर्च नहीं हो पाया है। यदि रिसर्च होता तो अश्वगंधा की नई किस्मों की खेती मरूधरा में होती नजर आती। गौरतलब है कि यह प्रदेश की पहली औषधीय फसल है, जिसे जीआई टैग प्राप्त हुआ है। इससे पूर्व व्यवसायिक फसल में सोजत मेहंदी को जीआई टैग प्रदान किया गया था। सुगंधित पादप अनुसंधान निदेशालय के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. परमेश्वर लाल सारन ने बताया कि राजस्थान में अश्वगंधा को जंगली वनस्पति माना जाता है। लेकिन, यह देश-दुनिया के लिए सेहत का खजाना है। कई औषधीय गुण इस वनस्पति में छिपे है। इस कारण राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। गौरतलब है कि राजस्थान में इसकी खेती महज 500 हैक्टयर क्षेत्र में हो रही है। जबकि, मध्यप्रदेश, गुजरात और पंजाब में इसकी खेती को तेजी से प्रोत्साहन मिल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में 5-6 हजार हैक्टयर क्षेत्र में अश्वगंधा की खेती हो रही है। इससे प्रदेश में बहुमूल्य फसल की अनदेखी का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है। गौरतलब है कि नागौरी असगंध को जीआई टैग मिलने के बाद सामने आई मीडिया रिपोर्ट में थोथा चना जैसी स्थिति भी देखने को मिली है यानी जिन कृषि विशेषज्ञों के बयान सामने आए, उनका दूर तक इस फसल से लेना-देना नहीं है।

किसान-वैज्ञानिक ज्ञान का परिणाम
उन्होने बताया कि नागौरी अश्वगंधा को जीआई टैग मिलने में किसानों का पारम्परिक ज्ञान भी अहम रहा है। नोखा -बीकानेर के किसान केशाराम और परेवरा-चुरू के बीरबलराम का पारंपरिक ज्ञान, जमीनी अनुभव और सक्रिय भागीदारी ने नागौरी अश्वगंधा को वैज्ञानिक प्रमाण तक पहुुंचाया है। बता दें कि जीआई टैग टीम में निदेशालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. केए कलारिया, वैज्ञानिक डॉ. रोहन सरकार, एमके मित्तल, डॉ. पारूल चौधरी और निदेशक डॉ. मनीष दास शामिल रहे है। वैज्ञानिकों की इस टीम ने तीन साल की अथक मेहनत के बाद यह उपलब्धि हासिल की है। इसमें राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, नई दिल्ली और कृषि विभाग, राजस्थान का भी सहयोग रहा है। गौरतलब है कि नागौरी वेलफेयर सोसाइटी, नागौर के नाम से जीआई टैग का पंजीयन हुआ है।
बेहतरीन जड़ गुणवत्ता
नागौरी अश्वगंधा की विशिष्टता और उच्च व्यावसायिक मूल्य मुख्य रूप से इसकी विशिष्ट जड़ आकारिकी और भौतिक गुणवत्ता से उत्पन्न होते हैं। मध्य से पश्चिमी राजस्थान में उत्पादित जड़ें लंबी, मोटी, भंगुर, गुहा रहित और स्टार्चयुक्त होती हैं। मध्य राजस्थान में बुवाई के 240-250 दिन बाद फसल तैयार हो जाती है। इसकी सूखी जड़ में 9.33 प्रतिशत तक भंगुरात मिलती है। वहीं, स्टार्च की मात्रा करीब 35 प्रतिशत तक है। डॉ. सारन ने बताया कि नागौरी अश्वगंधा की फलियां 8-9 मिमी और नारंगी-लाल रंग की होती है। जबकि, गुजरात में उगाई जा रही अश्वगंधा की फलियां 6-7 मिमी. और रंग अधिक चमकीला नारंगी-लाल होता है। यही कारण है कि हर्बल, फार्मास्युटिकल और न्यूट्रास्युटिकल उद्योगों में नागौरी अश्वगंधा की मांग ज्यादा है।
यहां होती है खेती
प्रदेश में नागौरी अश्वगंधा की खेती नागौर, बीकानेर, चूरू, बाड़मेर, सीकर और जोधपुर के आसपास के क्षेत्रों में होती है। यह फसल प्राकृतिक रूप से एक विशिष्ट पादप-भौगोलिक क्षेत्र के अनुकूल है। जिसकी विशेषता शुष्क से अर्ध शुष्क कृषि पारिस्थितिकी में बेहत्तर पैदावार देना है। गौरतलब है कि नागौर, कुचामन, लाडनू, बिदासर, डूंगरगढ़, नोखा और आसपास के क्षेत्रों के चुनिंदा किसान समूह इसकी व्यवसायिक खेती कर रहे है। गौरतलब है कि नागौरी असगंध का सालाना उत्पादन 300 टन सूखी जड़े है। इससे करीब 19 क्विं टल बीज प्राप्त होता है।
सेहत के लिए ऐसे वरदान
आयुर्वेद जानकारों के अनुसार अश्वगंधा की जड़ में कई प्रकार के एल्केलाइड और एमिनो एसिड पाए गए हैं। वहीं, प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट, विदाफेरिन-ए की मात्रा पाई जाती है। जिनके कारण यह शरीर के लिए औषधि का काम करती है। इसके सेवन से थकान दूर होकर नई ताकत आ जाती है। असगंध की जड़ का चूर्ण दवा के रूप में लिया जाता है।
113.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर का बाजार
प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पीएल सारण ने बताया कि देश में 8429 मीट्रिक टन के वार्षिक उत्पादन के साथ अश्वगंधा उगाने के लिए लगभग 10,770 हैक्टयर भूमि का उपयोग किया जाता है। वैश्विक अश्वगंधा बाजार वर्ष 2030 में 113.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।