पौंड क्रांति से हाईटेक में नम्बर 1 राजस्थान
(सभी तस्वीरें- हलधर)पीयूष शर्मा
जयपुर। पाताल तोडऩे के बाद भी प्रदेश में पानी-पानी का शोर थम नहीं रहा है। समय के साथ पानी की पीड़ बढ़ती जा रही है। हालात, ऐसे ही बने रहे तो निकट भविष्य में कमांड क्षेत्रों में सिंचाई तो दूर, प्यास बुझाने के लिए भी पश्चिमी राजस्थान के जैसे टांको का सहारा लेना पड़ सकता है। क्योंकि, पानी के लिए लोग चार सौ फीट से भी ज्यादा गहरे ट्यूबवैल खोद रहे हैं। इसी कारण राज्य में पानी का दोहन 150 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है। वहीं, दूसरी ओर बरसाती पानी की सुखद तस्वीर प्रदेश में देखने को मिल रही है। पौंड का पानी खेतों में क्रांति ला रहा है। किसानों की जीवनरेखा बन रहा है। साथ ही, भाग्यरेखा को बदल रहा है। शायद यही कारण है कि फार्मपौंड और डिग्गी के पानी की बदौलत राजस्थान हाइटेक खेती यानी संरक्षित खेती के क्षेत्र में देश में संभवत: नम्बर वन बन चुका है। यह बात हम नहीं सरकार के आंकडे कह रहे है। गौरतलब है कि प्रदेश में संरक्षित खेती का दायरा बीते कुछ सालों में बढ़कर 1 करोड़ वर्ग मीटर से ज्यादा हो गया है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि फार्मपौंड और डिग्गी में बरसाती पानी के संग्रहण से ही यह सुखद तस्वीर राजस्थान में देखने को मिल रही है। क्योंकि, खेत में सिंचाई सुविधा विकसित होने के बाद परम्परागत ही नहीं, किसान संरक्षित खेती के बारे में सोचना शुरू कर देता है। इस कारण संरक्षित खेती का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। जबकि, प्रदेश में भूजल की स्थिति एक बडे संकट का इशारा कर रही है। तीन दशकों में भूजल का दोहन 35 प्रतिशत से बढकर 150 प्रतिशत तक पहुंच गया। राजस्थान में 299 में से केवल 38 ब्लॉक ही सुरक्षित, 216 ब्लॉक में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा। राज्य में सिर्फ हनुमानगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर और गंगानगर को ही सुरक्षित माना गया है। इसके अलावा किसी भी जिले की स्थिति ठीक नहीं है। चित्तौडग़ढ़ जिले में जल दोहन का प्रतिशत 161.62 है। जबकि, भीलवाड़ा 156.67, प्रतापगढ़ 130.41, उदयपुर 102.66, अजमेर 138.07, अलवर 188.05, बांसवाड़ा 69.18, बारां 134.2, बाड़मेर 132,03, भरतपुर 123.48, बीकानेर 139.15, बूंदी 100.74, चूरू 128.89, दौसा 243.07, धौलपुर 139,75, डूंगरपुर 61.8, गंगानगर 40.02, हनुमानगढ़ 64.06, जयपुर 222.82, जैसलमेर 357.67, जालोर 178.19, झालावाड़ 115, झुंझुनूं 219.59, जोधपुर 258.41, करौली 159.15, कोटा 110.6, नागौर 183.84, पाली 158.01, राजसमंद 125.14, सवाई माधोपुर 159.29, सीकर 194.12 और टोंक में जल दोहन 102.68 प्रतिशत हो रहा है। भूजल दोहन की इस स्थिति को देखकर जल संकट का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है।
दायरे में 12 लाख हैक्टयर
कृषि विभाग की माने तो फार्मपौंड, डिग्गी के माध्यम से प्रदेश के 12 लाख हैक्टयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा विकसित हो चुकी है। इससे ना केवल बरसाती पानी का सदुपयोग सुनिश्चित हुआ है। बल्कि, फसल पैदावार और उत्पादकता में भी बढौत्तरी दर्ज हो रही है। गौरतलब है कि जल संकट से जूझ रहे जिलों में डिग्गी और फार्मपौंड किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुके है। पौंड में भरे पानी ने उन्हें इतना आश्वस्त कर दिया है कि खेती-किसानी को इस पानी से बचाया जा सकता है।
एक लाख से ज्यादा फार्मपौंड
प्रदेश में अब तक 1 लाख 3 हजार फार्मपौंड का निर्माण हो चुका है। गौरतलब है कि सरकार ने बरसाती पानी बचाने के लिए वर्ष 2001-02 के दौरान किसानों को खेत तलाई यानी फार्मपौंड पर अनुदान देना शुरू किया था। कृषि विभाग के द्वारा कच्चे फार्म पौंड यानी खेत तलाई पर किसानों को लागत का 60 फीसदी अनुदान दिया जाता है। जबकि, प्लास्टिक लाइनिंग के साथ निर्मित पौंड पर 80 फीसदी अनुदान देय है।
4 से 12 लाख लीटर पानी
कृषि विशेषज्ञ राजेन्द्र खींचड़ ने बताया कि पानी संग्रहण की दर पौंड के आकार पर निर्भर करती है। वैसे माना जाता है कि एक सामान्य आकार के फार्मपौंड में 4 लाख लीटर पानी जमा होता है। वहीं, पौंड का आकार बढ़ा होने पर 4 से 12 लाख लीटर पानी एकत्रित किया जा सकता है।
61 हजार से ज्यादा डिग्गी
उन्होंने बताया कि श्रीगंगनगर, हनुमानगढ़, बीकानेर सहित दूसरे जिलों में नहरी और बरसाती पानी के संग्रहण के लिए सरकार डिग्गी निर्माण पर अनुदान मुहैया करवा रही है। प्रदेश में अब तक 61 हजार 768 डिग्गी का निर्माण हो चुका है। गौरतलब है कि सरकार ने वर्ष 2019-20 से किसानों को डिग्गी निर्माण पर अनुदान देना शुरू किया था। उन्होंने बताया कि एक डिग्गी निर्माण पर करीब 4 लाख रूपए की लागत आती है। इसके निर्माण पर 75 प्रतिशत अनुदान देय है।
1 करोड़ वर्ग मीटर में संरक्षित खेती
उद्यानिकी आयुक्तालय के मुताबिक संरक्षित खेती में राजस्थान देश में नम्बर वन बन चुका है। सरकार के प्रोत्साहन से प्रदेश में 1 करोड़ 6 लाख हैक्टयर क्षेत्र में पॉली हाउस, शैडनेट जैसी संरचनाओं का विकास हो चुका है। इससे खीरा, टमाटर, रंगीन शिमला मिर्च, स्वीटकॉर्न, कट फ्लावर का घरेलू उत्पादन बढाने में मदद मिली है। गौरतलब है कि इजरायली तकनीक खेती में जयपुर जिला प्रदेश में पहले स्थान पर आ चुका है।