सोलर पंप में इजराइली पैटर्न अपनाने की जरूरत
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। खेती से लाभ और किसान की आय बढाने केलिए खेतों में स्थापित होने वाले सोलर पंप का तरीका बदलने की आवश्यकता है। क्योंकि, संरक्षित खेती में हम इजराइल से सीख रहे है तो सोलर संयंत्र में क्यों नहीं? गौरतलब है कि इजरायल में सोलर पंप संयंत्र की छाया और आसपास की जगह में फसल का उत्पादन लिया जा रहा है। जबकि, यहां संयंत्र स्थापना के दौरान कं क्रीट बिछाकर जमीन को हमेशा के लिए अनउपजाऊ बना दिया जाता है। इससे किसान को फसल के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इस स्थिति को देखा और समझा है शैक्षणिक भ्रमण पर इजराइल गए कृषि महाविद्यालय नागौर के अर्थशास्त्री डॉ. विकास पावडिय़ा ने। उन्होंने बताया कि यहां पर टिकाऊ खेती पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही, मृदा के सूक्ष्मजीवों के जीवन पर फोकस किया जा रहा है। शायद यही कारण है कि यहां पर सोलर पंप स्थापना का पैटर्न काफी अलग है। गौरतलब है कि इस अध्ययन यात्रा में डॉ. विकास के साथ-साथ दुनिया के 13 देशों के कृषि वैज्ञानिक शामिल है।
हजार मीटर पर जलशोधन
उन्होने बताया कि यहां पानी की कमी राजस्थान से ज्यादा है। इस कारण पानी का रिसाइकल करके खेती सहित दूसरे कामों में उपयोग लिया जा रहा है। उन्होने बताया कि एक हजार मीटर पर जलशोधन संयंत्र लगाए हुए है। इसमें घर से निकलने वाले पानी का शोधन किया जाता है। फिर, इस पानी को खेती सहित अन्य काम में लिया जाता है। उन्होंने बताया कि घर से निकलने वाले पानी में हैवी मेटल्स नहीं होते है।
खजूर का ज्यादा पानी
उन्होंने बताया कि यहां पर खजूर किस्म मेडजूल की खेती भी बड़े पैमाने पर की जा रही है। लेकिन, यहां लवण की समस्या ज्यादा है। इसके चलते किसान पौधें को सामान्य से तीस फीसदी ज्यादा पानी देते है। इससे पौधें से आस-पास से लवण वापिस खाली जमीन में चला जाता है।
इधर मृदा होती माटी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश की लगभग 30 प्रतिशत कृषि भूमि में मिट्टी का जैविक कार्बन 0.5 प्रतिशत से भी कम रह गया है। बीते दो दशक में मिट्टी के कार्बन स्तर में लगभग 25 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। कई इलाकों में जिंकए सल्फ र और बोरॉन जैसे जरूरी सूक्ष्म तत्वों की भारी कमी सामने आ रही है। हर साल लगभग 5 अरब टन मिट्टी कटाव के कारण बह जाती है। जिससे करीब 15 लाख टन पोषक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं। इसका सीधा असर गेहूं, चावल और दलहन जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार पर पड़ रहा है।