गाजर घास का बढ़ता कहर, खेती और इंसानों के लिए बड़ा खतरा
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। गाजर घास के एक पौधे से 10 हजार से अधिक पौधे उगते हैं, इसलिए हर साल अगस्त और सितम्बर में इन जहरीले पौधों को समाप्त करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाता है। लेकिन, यह अभियान भी कृषि संस्थानों के परिसर अथवा गोदित गांवों तक सीमित होकर रह जाता है। यदि इस ओर सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो निकट भविष्य में इस घास के विस्तार के चलते निवाले पर संकट गहरा सकता है। वहीं, पर्यावरण भी इससे प्रदूषित होगा। आम-तौर पर फरवरी मार्च के महीने में इस जहरीले घास के नए पौधे उत्पन्न होते हैं, और सितम्बर-अक्टूबर के महीने में पौधे से नीचे गिरकर नए पौधे उत्पन्न होते हैं। पौधे के बीज हवा से उड़कर और किसी दूसरे माध्यम से विभिन्न स्थानों पर पहुंच कर उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए इस जहरीले पौधे को नष्ट करने के लिए अभी से ही व्यापक स्तर पर अभियान चलाना चाहिए। इस दिशा में सामाजिक और गैर सरकारी संस्थाओं को भी आगे आने की जरूरत है।
क्या है गाजर घास
पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस यानी गाजर घास का प्रवेश भारत में सन् 1960 में अमेरिका से आयात किये गये गेहूं के साथ हुआ। यह एक बहुशाखित, वार्षिक, सीधा खड़ा रहने वाला खरपतवार है। अपने विकास के प्रारंभिक चरण के दौरान पत्तियों का एक बेसल रोसेट बनाता है। यह आमतौर पर 0.5-1.5 मीटर तक लंबा होता है। लेकिन, कभी-कभी यह दो मीटर अथवा उससे अधिक तक पहुंच जाता है। भारत में इसे चटक चांदनी, कांग्रेस घास, गांधी टोपी और कड़वी घास आदि नामों से भी जाना जाता है।
कैसे फैलती है गाजर घास
गाजर घास का फैलाव मुख्यतः इसके बीजों द्वारा होता है जो खाद, सिंचाई के पानी, हवा तथा वाहनों और रेल गाड़ियों द्वारा एक के स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। यह घास मुख्यतः खुले स्थानों, औद्योगिक क्षेत्रों, सड़कों और रेलवे लाइन के किनारे, अकृषित भूमि और मनुष्य के निवास स्थान के पास पायी जाती है।
20 से ज्यादा प्रजाति
इस खरपतवार की लगभग 20 प्रजातियां पूरे विश्व में फैली हैं। मूलतः यह मेक्सिको, दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन का निवासी है। हमारे देश में इसे परित्यक्त भूमि, गांव-कस्बों के आसपास, खेतों, खेत की मेडों, आवासीय कॉलोनियों, रेलवे ट्रैक, सड़कों, जल निकासी और सिंचाई नहरों आदि पर भारी मात्रा में उगते हुए देखा जा सकता है। अपनी उच्च उर्वरक क्षमता के कारण एक पौधा 10,000 से 15,000 भार में हल्के सुषुप्ता रहित बीज पैदा करता है। बीज अत्यधिक सूक्ष्म होते हैं, जो अपनी दो स्पंजी गद्दियों की मदद से हवा तथा पानी द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से उड़ कर फैल जाते हैं।
सावधानी से उखाड़े पौधे
मानव आवास स्थानों के आस-पास और क्यारियों में उगे गाजर घास/पार्थेनियम के पौधों को फूल आने से पहले समूल से उखाड़कर नष्ट कर दें। इसके गिने-चुने पौधे हों तो उन्हें हाथ से उखाड़ा जा सकता है। ज्यादा क्षेत्र पर इन्हें हाथ से उखाड़ना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। अतः इस परिस्थिति में यांत्रिक विधि से नष्ट करना चाहिए। हाथ से उखाड़ते समय ध्यान रखना चाहिए कि पौधे का शरीर से सीधा सम्पर्क न हो। इसके लिए हाथों में रबड़ के दस्ताने पहने अथवा पॉलिथीन लपेटी जा सकती है। पौधे के जड़ से न उखड़ने और दराती आदि से काटने पर ये पुनः तेजी से बढ़ते हैं और इनमें बहुत सारी टहनियां निकलती हैं, जिसके कारण इनकी पुनर्वृद्धि पहले से अधिक हो जाती है। अतः इन्हें समूल नष्ट करना चाहिए।
कैसे करे समाप्त
गाजर घास के जहरीले पौधों को नष्ट करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाए जा सकते हैं, परन्तु इस जहरीले पौधे को पूर्ण रूप से समाप्त करने का सबसे आसान तरीका यह है कि इस पौधे को जड़ से उखाड़कर इसे जला दिया जाए। ताकि इन पौधों के बीज भी जलकर पूर्ण रूप से नष्ट हो जाएं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लाइफोसेट और मेट्रिब्युजिन नामक केमिकलों का घोल तैयार करके गाजर घास पर स्प्रे करके इसे नष्ट किया जा सकता है।
मानव-पशुधन- फसलों के लिए खतरा
यह खरपतवार जितना पशुओं के लिए खतरनाक है, उतना ही मनुष्यों के लिए भी। यह मनुष्यों एवं पशुओं में कई स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न करता है। इस खरपतवार के लगातार संपर्क में आने पर मनुष्यों में डर्मेटाइटिस, एक्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा, श्वसन तंत्र में संक्रमण, गले में छाले, दस्त, मूत्र पथ के संक्रमण, पेचिश आदि की बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट, खुजली, बालों का झड़ना, लार गिरना, अतिसार, मुंह और आंतों में छाले अधिक मात्रा चर लेने से उनकी मृत्यु भी हो सकती है।
ऐसे करें रासायनिक खात्मा
इसकी रोकथाम के लिए गैर कृषि क्षेत्रों में पौधे पर फूल आने से पूर्व शाकनाशी रसायन एट्राजिन 50 प्रतिशत डब्लूपी 1.5 किग्रा. अथवा ग्लाइफोसेट 71 प्रतिशत डब्लूपी 2 किग्रा अथवा मेट्रीब्युजिन 70 प्रतिशत डब्लूपी 2 किग्रा. प्रति हैक्टेयर में किया जाना चाहिए। फसल जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा में एट्राजिन 50 प्रतिशत डब्लूपी 1 से 1.5 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर बुवाई के तुरंत बाद (अंकुरण से पूर्व) प्रयोग किया जाना चाहिए।