ग्वारपाठा की फसल से बड़ा मुनाफा कमाना है तो करना होगा ये काम
(सभी तस्वीरें- हलधर)राजस्थान में ग्वारपाठा (एलोवेरा) की बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी खेती का रकबा धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन बीमारी और सही विपणन की कमी किसानों की आय को प्रभावित कर रही है। कई बार फसल में रोग लगने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों घट जाते हैं, जिससे बाजार में उचित भाव नहीं मिल पाता। ऐसे में जरूरी है कि किसान शुरुआत से ही फसल की सही देखभाल और रोग नियंत्रण पर ध्यान दें। समय पर रोग पहचान, संतुलित पोषण, जल निकास की सही व्यवस्था और जरूरत पड़ने पर उचित दवा का छिड़काव करके ग्वारपाठा की फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे न सिर्फ उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि बाजार में बेहतर दाम मिलने की संभावना भी मजबूत होगी।
नीचे ग्वारपाठे की फसल में लगने वाले विभिन्न रोगों की जानकारी दी जा रही है। साथ ही रोग नियंत्रण और उपचार के लिए वैज्ञानिक उपाय भी बताए गए हैं। किसान दी गई जानकारी का पालन कर अपनी फसल का बचाव कर सकते हैं।
गोलाकार धब्बे
रोग का प्रकोप होने पर मैन्कोजेब 25 मिली अथवा कार्बेण्डाजिम 1 मिली प्रति हैक्टयर की दर से छिड़काव करें।
पत्ती धब्बा और सिरा झुलसा
पौधा के मलबे को नष्ट करें। रोग नियंत्रण के लिए कैप्टान 2 मिली अथवा मैन्कोजेब 25 मिली प्रति लीटर की दर से नियमित छिड़काव करें।
म्लानी रोग या विल्ट
मृदा का सौरीकरण करें। कार्बेण्डाजिम 1 मिली अथवा कैप्टान 2 मिली प्रति लीटर की दर से पौधे का उपचार करें।
रतुआ रोग
डाइथेन जेड-78 का 2 मिली प्रति हैक्टयर की दर से छिड़काव करे। मैन्कोजेब 2.5 किग्रा अथवा घुलनशील गंधक 3 किग्रा. प्रति हैक्ट. की दर से छिडकाव करें।
पत्ती धब्बा रोग
कॉपर और कैप्टॉन कवकनाशी का प्रयोग 12-14 दिनों के अंतराल पर बीमारी को नियंत्रित करने के लिए करें।
जीवाणु गीली सड़न
स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 300 मिली ग्राम एक ली. पानी का प्रयोग रोग संक्रमण कम करता हैं।
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