ऊंटनी के दूध की शेल्फ लाइफ बढ़ेगी, वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक

नई दिल्ली 05-Oct-2026 02:55 PM

ऊंटनी के दूध की शेल्फ लाइफ बढ़ेगी, वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा

जयपुर। एक वैज्ञानिक शोध से ऊं टनी के दुग्ध से जुड़े सारे मिथक अब टूट चुके है। इससे रेबारी परिवारों तक सीमित रहने वाले दुग्ध की प्रोसेसिंग की राह आसान होगी। वहीं, दुग्ध सेवन के बाद पाचन संबंधी दिक्कत भी नहीं होगी। गौरतलब है कि वैज्ञानिकों ने ऊंटनी के दुग्ध में मौजूद सूक्ष्म आणविक तत्वों को वैज्ञानिक सांचे में ढ़ाला है, जो अब तक एक चुनौति बना हुआ था। राजुवास के पशु चिकित्सा महाविद्यालय बीकानेर और राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर के संयुक्त शोध से यह राह आसान हुई है। उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान दूध के प्रोटीन घटकों को विशेष एंजाइमेटिक और बायो-केमिकल प्रक्रियाओं के माध्यम से हाइड्रोलाइज करके उपयोगी बायोएक्टिव पेप्टाइड्स में रूपांतरित किया गया। इस शोध तकनीक को भातरीय पेटेंट प्राप्त हुआ है। इस शोध टीम में प्रमुख अन्वेषक डॉ. अनीता तंवर, डॉ. आरके बेरवाल, डॉ. योगेश कुमार और डॉ. अनिल हर्ष शामिल रहे। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है। क्योंकि, राजुवास को को मात्र दो माह की अल्पावधि में प्राप्त होने वाला यह दूसरा बड़ा राष्ट्रीय पेटेंट है।

बढेगी जैव सक्रियता

डॉ. अनीता तंवर ने बताया कि पारंपरिक और लोक-चिकित्सा में ऊंटनी के दूध को अपने स्वास्थ्यवर्धक गुणों के लिए सदियों से जाना जाता रहा है। लेकिन, इसके सूक्ष्म आणविक घटकों की शक्ति को वैज्ञानिक ढांचे में ढालना हमेशा से एक चुनौती रहा। उन्होने बताया कि शोध के दौरान दूध में मौजूद प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट्स के कार्यात्मक गुणों और उसकी जैव-सक्रिय  क्षमता को आधुनिक तकनीक से कई गुना अधिक समृद्ध बनाने पर ध्यान केंद्रित रहा।

बढेगी सेल्फ लाइफ

उन्होने बताया कि दूध के प्रोटीन घटकों को विशेष एंजाइमेटिक और बायो-केमिकल प्रक्रियाओं के माध्यम से हाइड्रोलाइज करके उपयोगी बायोएक्टिव पेप्टाइड्स में रूपांतरित किया गया। इससे दूध के कार्यात्मक व्यवहार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह तकनीक ऊंटनी के दूध की सीमित शेल्फ-लाइफ और प्रोसेसिंग से जुड़ी जटिलताओं को दूर करने में कारगर साबित होगी। साथ ही, मानव शरीर में पाचन से जुड़ी समस्याएं भी दूर होगी।

न्यूट्रास्यूटिकल-फूड इंडस्ट्री को फायदा

इस पेटेंट तकनीक द्वारा तैयार प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट्स का इस्तेमाल स्वास्थ्यवर्धक न्यूट्रास्यूटिकल सप्लीमेंट्स, डाइटरी कैप्सूल्स और स्पोर्ट्स न्यूट्रिशन ड्रिंक्स में बेस सामग्री के तौर पर किया जा सकेगा।

चिकित्सीय क्षमता का विस्तार

वैज्ञानिक रूप से यह स्पष्ट है कि ऊंटनी के दूध में इंसुलिन जैसी संरचना वाले प्रोटीन, लैक्टोफेरिन और उच्च कोटि के इम्यूनोग्लोबुलिन प्रचुर मात्रा में होते हैं। डॉ. तंवर की हाइड्रोलाइजेट्स तकनीक इसके एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-डायबिटिक (मधुमेह-रोधी) और एंटी-हाइपरटेंसिव (रक्तचाप नियंत्रक) गुणों को अधिक सक्रिय और स्थिर बना देती है।

तीव्र पोषण अवशोषण

हाइड्रोलाइज्ड प्रोटीन शरीर के आंतों में बहुत तेजी से अवशोषित होता है। यह बच्चों, बुजुर्गों, कुपोषण के शिकार व्यक्तियों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों के लिए एक सहज और प्रभावी पोषण विकल्प साबित होगा।

औद्योगिक प्रसंस्करण

कच्चे दूध के मुकाबले हाइड्रोलाइज्ड प्रोटीन पाउडर को अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे ऊंटनी के दूध के बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्पाद तैयार करना संभव हो सकेगा।

आजीविका में होगा सुधार

उन्होने बताया कि ऊंटपालक ऊंटनी के दूध का सीमित विपणन ही कर पाते थे। साधारण दूध के बदले जब दूध से उच्च-मूल्य वाली पेटेंटेड तकनीक द्वारा न्यूट्रास्यूटिकल उत्पाद बनेंगे, तो ऊंटनी के दूध के बाजार मूल्य में भारी उछाल आएगा। इससे डेयरी कंपनियों और फार्मास्युटिकल उद्योगों के जुडऩे से पशुपालकों के लिए दूध संकलन केंद्र और नियमित आय के साधन विकसित होंगे। साथ ही, ऊष्ट्र संरक्षण और संवद्र्धन को भी बढ़ावा मिलेगा।

इस शोध से कैमल मिल्क वैल्यू चेन को विकसित करने में मदद मिलेगी। ऊंटपालकों की आजीविका में सुधार होगा। वहीं, मधुमेह सहित कई बीमारियों से पीडि़त लोगों को भी लाभ मिलेगा।

डॉ. सुमंत व्यास, कुलगुरू, राजुवास, बीकानेर


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