भारत खुद को कृषि प्रधान देश कहता है, लेकिन खेतों में फसल बचाने के नाम पर ऐसा खतरनाक खेल चल रहा है जिसने किसानों की जान और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों को खतरे में डाल दिया है। देश के कीटनाशक बाजार का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा नकली, घटिया या मिलावटी पेस्टिसाइड्स के कब्जे में होने का अनुमान है। यह सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि किसानों के जीवन, फसलों और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर सीधा हमला है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस समस्या की जानकारी केंद्र और राज्य सरकारों दोनों को है। इसके बावजूद नकली कीटनाशकों का कारोबार लगातार फल-फूल रहा है। राजस्थान विधानसभा में हाल ही में सरकार ने स्वीकार किया कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच घटिया और नकली पेस्टिसाइड्स के कारण 535 किसानों की मौत हुई। यह आंकड़ा केवल एक राज्य का है, जबकि समस्या देशव्यापी है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब कई खतरनाक कीटनाशकों पर पहले से प्रतिबंध है, तब वे बाजार में कैसे पहुंच रहे हैं? और यदि सरकार नया पेस्टीसाइड्स मैनेजमेंट बिल 2026 लाने जा रही है, तो क्या यह वास्तव में इस संगठित सिंडिकेट को रोक पाएगा?
सरकार पहले क्या कर चुकी है?
देश में खतरनाक कीटनाशकों की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, जिसकी अध्यक्षता भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के पूर्व राष्ट्रीय प्रोफेसर डॉ. अनुपम वर्मा ने की थी।
समिति को उन 66 कीटनाशकों की समीक्षा का जिम्मा दिया गया था जो दुनिया के कई देशों में प्रतिबंधित थे, लेकिन भारत में इस्तेमाल किए जा रहे थे।
समिति की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने वर्ष 2016 में 12 कीटनाशकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। इसके अलावा 6 अन्य कीटनाशकों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का निर्णय लिया गया। एंडोसल्फान पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक:
- 46 कीटनाशकों और 4 फॉर्मुलेशन पर प्रतिबंध या फेज आउट लागू किया गया है।
- 8 कीटनाशकों का रजिस्ट्रेशन रद्द किया गया है।
- 9 कीटनाशकों के उपयोग पर कड़ी शर्तें लगाई गई हैं।
- सरकार का दावा है कि वह समय-समय पर वैज्ञानिक शोध और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के आधार पर कीटनाशकों की समीक्षा करती रहती है।
अब बायोपेस्टिसाइड्स पर जोर
केंद्र सरकार का कहना है कि भविष्य की खेती को सुरक्षित बनाने के लिए बायोपेस्टिसाइड्स यानी जैविक कीटनाशकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सरकार का मानना है कि जैविक विकल्प मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि किसानों के बीच आज भी रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल अधिक है और नकली उत्पादों का कारोबार तेजी से फैल रहा है।
यही वजह है कि सरकार की नीतियों और जमीनी क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
राजस्थान की घटनाएं क्यों हैं खतरनाक संकेत?
- राजस्थान में सामने आए मामले पूरे देश के लिए चेतावनी हैं।
- हाल के महीनों में राज्यभर में 30 से अधिक फैक्ट्रियों पर छापेमारी की गई, जहां मार्बल की धूल, पत्थर का चूरा और अन्य खतरनाक पदार्थ मिलाकर नकली खाद, बीज उपचार रसायन और कीटनाशक तैयार किए जा रहे थे।
- ये उत्पाद नामी कंपनियों के ब्रांड की तरह पैक करके किसानों को बेचे जा रहे थे।
- राज्य के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने स्वीकार किया कि नकली कीटनाशकों ने कपास की फसल में सफेद मक्खी नियंत्रण को पूरी तरह विफल कर दिया, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
- विशेषज्ञों का कहना है कि नकली पेस्टिसाइड्स केवल फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि उनमें मौजूद अज्ञात रसायन मिट्टी, पानी और खाद्य श्रृंखला को भी प्रदूषित कर सकते हैं।
- यानी नुकसान सिर्फ किसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंततः उपभोक्ता की थाली तक पहुंचता है।
बैन के बावजूद बाजार में कैसे पहुंच रहे हैं खतरनाक केमिकल?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
मोनोक्रोटोफास जैसे कई खतरनाक रसायनों पर विभिन्न स्तरों पर प्रतिबंध या कड़े प्रतिबंधात्मक प्रावधान मौजूद हैं। इसके बावजूद ग्रामीण बाजारों में ऐसे उत्पाद खुलेआम बिकते देखे जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं:
- पहली, निरीक्षण व्यवस्था की कमजोरी।
- दूसरी, लाइसेंसिंग और सैंपल जांच प्रणाली में भ्रष्टाचार।
- तीसरी, किसानों में जागरूकता की कमी।
- कई बार किसान सस्ते उत्पाद के लालच में या दुकानदार की सलाह पर ऐसे उत्पाद खरीद लेते हैं, जिनकी गुणवत्ता संदिग्ध होती है।
क्या है पेस्टीसाइड्स मैनेजमेंट बिल 2026?
- सरकार अब 1968 के पुराने कीटनाशक कानून को बदलकर नया पेस्टीसाइड्स मैनेजमेंट कानून लाने की तैयारी कर रही है।
- इस बिल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पहली बार रासायनिक और जैविक दोनों प्रकार के पेस्टिसाइड्स को एक ही कानूनी ढांचे के तहत लाया जाएगा।
- नए बिल में जोखिम आधारित नियमन (Risk-Based Regulation) की व्यवस्था प्रस्तावित है।
- इसका मतलब यह है कि केवल उत्पाद की बिक्री नहीं, बल्कि उसके मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव का भी मूल्यांकन किया जाएगा।
- यदि किसी पेस्टिसाइड से गंभीर जोखिम दिखाई देता है तो सरकार उसके खिलाफ पहले से कार्रवाई कर सकेगी।
- सरकार का दावा है कि यह कानून आधुनिक कृषि चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय चिंताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है।
लेकिन विशेषज्ञ क्यों उठा रहे हैं सवाल?
हालांकि प्रस्तावित बिल को लेकर कई विशेषज्ञों ने गंभीर चिंताएं भी जताई हैं।
उनके अनुसार:
- कीटनाशक विषाक्तता के शिकार किसानों और मजदूरों के लिए कोई अलग राहत फंड नहीं है।
- राष्ट्रीय स्तर पर विषाक्तता घटनाओं की निगरानी और डेटा संग्रह की व्यवस्था स्पष्ट नहीं है।
- "Poisoning" और "Worker" जैसे महत्वपूर्ण शब्दों की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।
- राज्यों की शक्तियां सीमित कर दी गई हैं।
- विशेष रूप से राज्यों को किसी खतरनाक कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार केवल एक वर्ष तक दिया गया है।
- उसके बाद उन्हें केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी।
- विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राज्यों की त्वरित कार्रवाई की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
क्या नया कानून बदलाव ला पाएगा?
- असल सवाल यही है।
- कानून बनाना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर लागू करना सबसे कठिन काम होता है।
- यदि निरीक्षण व्यवस्था मजबूत नहीं हुई, यदि नकली उत्पाद बनाने वाली फैक्ट्रियों पर लगातार कार्रवाई नहीं हुई, यदि किसानों को असली और नकली उत्पाद की पहचान नहीं सिखाई गई, तो नया कानून भी पुराने कानून की तरह फाइलों तक सीमित रह सकता है।
- आज देश का किसान दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ कीटों और बीमारियों से फसल बचाने की चुनौती है, दूसरी तरफ नकली कीटनाशकों का जाल।
- ऐसे में पेस्टीसाइड्स मैनेजमेंट बिल 2026 किसानों के लिए उम्मीद की किरण जरूर बन सकता है, लेकिन इसकी सफलता कानून की भाषा से ज्यादा उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
- क्योंकि अगर निगरानी कमजोर रही, तो खेतों में कीट कम और किसानों की जिंदगी ज्यादा खतरे में पड़ती रहेगी।