कैंसर बना निमेटॉड, गाजर-अरंड़ी किसानों को करोड़ों का नुकसान

नई दिल्ली 13-Jul-2026 04:30 PM

कैंसर बना निमेटॉड, गाजर-अरंड़ी किसानों को करोड़ों का नुकसान

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जयपुर। प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विभाग में सूत्रकृमि विशेषज्ञो की कमी किसानों को बड़ा नुकसान दें रही है। हालात, यही रहे तो पूरा प्रदेश जमीन के भीतर छिपे हुए कैंसर की गिरफ्त में होगा। क्योंकि, निमेटॉड ने संरक्षित फसल, दाल, अमरूद, नागौरी मेथी के बाद अब अरंड़ी और गाजर की फसल को भी निवाला बनाना शुरू कर दिया है। जोधपुर क्षेत्र में गाजर और सिरोही जिले में अलग-अलग प्रजाति के निमेटॉड़ के चलते किसानों को फसली नुकसान उठाना पड़ रहा है। गौरतलब है कि गाजर में सालाना 75.412 करोड़ और अरंड़ी में 108.278 करोड़ की उपज निमेटॉड चट कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि फसल में निमेटॉड़ का पता लगाना किसानों के बूते से बाहर है। किसान बीमार पौधें को ठीक करने के लिए कीटनाशी और फंफूदनाशी का उपयोग करता हैं। लेकिन, उसे आर्थिक नुकसान से ज्यादा कुछ नहीं मिलता है। क्योंकि, शत्रु पौधें की जड़ में होता है। जहां तक कीटनाशी और फंफूदनाशी पहुंच ही नहीं पाते है। उन्होंने बताया कि सरकार ने निमेटॉड नियंत्रण पर ध्यान नहीं दिया तो गाजर की स्थिति भी जोधपुर की मथानिया मिर्च के जैसी हो सकती है। क्योंकि, किसान मिर्च उत्पादन के तैयार नहीं है और किसी के पास बताने के लिए कोई कारण नहीं है। लाइलाज  होती जा रही इस बीमारी का कोई इलाज वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है। ऐसे में किसान को नुकसान तय है। बता दें कि किसान खरीफ में अरंड़ी और अगस्त के दौरान अगेेती गाजर फसल की बुवाई शुरू कर देते हैं। उन्होंने बताया कि अरंड़ी में जुलाई से फरवरी और गाजर में सितम्बर से नवम्बर तक निमेटॉड का प्रकोप देखने को मिला है। गौरतलब है कि निमेटॉड से नागौरी मैथी में करीब 5 कटाई का नुकसान होता है। 

7 विशेषज्ञों के भरोसे राजस्थान

सूत्रों ने बताया कि प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय में सात निमेटॉलॉजिस्ट कार्यरत है। इनमें भी के वल तीन व्यक्ति ही फसली रिसर्च से जुड़े हुए है। निमेटॉड पर किसी फसल में विश्वविद्यालय स्तर पर रिसर्च होता है। लेकिन, वैज्ञानिकों की सिफारिशें कृषि विभाग की पीओपी में शामिल होने से रह जाती है। क्योंकि, इसके लिए कृषि विभाग के एटीसी सेंटर पर तीन साल ट्रायल जरूरी है। मजेदार बात यह है कि कृषि विभाग के इन केन्द्रों पर कोई सूत्रकृमि विशेषज्ञ ही तैनात नहीं है। 

यह है शुरूआती लक्षण

कृषि महाविद्यालय नागौर के सूत्रकृमि विशेषज्ञ डॉ. शक्ति सिंह भाटी ने बताया कि भूमि के ऊपर निमेटॉड के लक्षण पौधों की वृद्धि रुकना, पत्तियों का पीला पडऩा, दोपहर के समय मुरझाना खेत में जगह-जगह असमान वृद्धि , पौधों का बौना रह जाना फूल-फल कम लगना और पोषक तत्वों की कमी जैसे लक्षण शामिल है।

सड़ जाती है जड़े

उन्होंने बताया कि निमेटॉड़ के चलते पौधें की जड़ों में गांठें बनना जड़ों का विकृत होना, महीन जड़ों की संख्या कम होना, जड़ों का सडऩा और अत्यधिक शाखा युक्त जड़ें बनती है। उन्होंने बताया कि पौधें का जड़ तंत्र कमजोर होने से उसमें कई तरह के बैक्टीरिया और फंफूद का प्रकोप होता है। इससे पौधा धीरे-धीरे खत्म हो जाता हैं। 

गाजर में 34, अंरड़ी में 15 फीसदी गिरावट

उन्होंने बताया कि रिसर्च के दौरान गाजर में 34 फीसदी और अरंड़ी फसल में 15 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। बता दें कि अरंड़ी की फसल में जडग़ांठ और गाजर में प्रैटिलेंकस सूत्रकृमि से ज्यादा नुकसान होता है। वहीं , धान में 16-32 प्रतिशत, तम्बाकू में 59 प्रतिशत, नींबू में 40-70 प्रतिशत, दलहनी फसलों में 8 प्रतिशत और कपास में 10-15 प्रतिशत तक की हानि का आंकलन है।

क्या है सूत्रकृमि

सूत्रकृमि (निमेटॉड) सामान्य रूप से सूक्ष्म, कृमिसदृश, खण्डहीन, बेलनाकार, कूटगुहिक जन्तु हैं, जो मृदा में और पौधों पर परजीवी रूप में पाये जाते हैं। सूत्रकृमि के अग्रभाग में मुख-छिद्र होता है। इसी भाग में एक मजबूत खंजर (स्टाईलेट) होती हैं जिसकी सहायता से सूत्रकृमि की दूसरी अवस्था पौधों की पोषक जड़ो के अग्रभाग पर आक्रमण करती हैं। जिसके कारण जड़े भूमि से पोषण लेना बंद कर देती हैं और जड़ो में शारीरिक विकार (हायपरट्रॉफ ी और हायपरप्लासिया) उत्पन्न हो जाता हैं। जड़ो में गांठे बन जाती हैं। सूत्रकृमि में नर और मादा अलग-अलग होते हैं। सूत्रकृमि बहुत छोटे होने के कारण इनको सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा देखा जा सकता है। इस समय विश्व में लगभग 63 प्रजातियाँ और दो उप प्रजातियाँ मूल ग्रन्थि सूत्रकृमियों की विद्यमान हैं। 

ऐसे करें प्रबंधन

किसान सूत्रकृमि की रोकथाम के लिए किसी भी बायो एंजेट को 100 किलोग्राम गोबर खाद के साथ मिलाकर 15 दिन के लिए छोड़ दें। इसके बाद बुवाई के समय गोबर खाद को खेत में बिखेर दें। 


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