गेहूं-जौ फसल को कंडवा रोग से ऐसे बचाएं किसान

नई दिल्ली 07-Nov-2025 02:00 PM

गेहूं-जौ फसल को कंडवा रोग से ऐसे बचाएं किसान

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जयपुर। गेहूँ- जौ उत्पादक किसानों की एक छोटी सी चूक ना केवल देश की खाद्य सुरक्षा को आघात पहुंचाती है। बल्कि, लाखों टन फसल का नुकसान खेत में ही हो जाता है। वहीं, आर्थिक रूप से नुकसान का आंकड़ा करोड़ों में बैठता है। जी हां, गेहूं- जौ की फसल में बीजोपचार नहीं करने के कारण काफी नुकसान देश के किसानों को उत्पादन में हो रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक कण्डवा रोग के चलते सालाना 6-7 लाख टन गेहूं का नुकसान होता है। नुकसान के इस आंकड़े को गेहूं के मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य से गुणन करके देखे तो करीब 111 करोड़ का नुकसान हर साल  किसानों को हो रहा है। गौरतलब है कि गेहूं - जौ की फसल में पत्ती कण्डवा, अनावृत कंडवा और आवृत कडंवा रोग का प्रकोप होता है। वहीं, पीली रोली की समस्या भी समय के साथ प्रदेश में सिर उठाने लगी है। एसकेएनएयू के अन्तर्गत राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान दुर्गापुरा के गेहूं- जौ विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप शेखावत ने बताया कि खड़ी फसल में कण्डवा रोगों का कोई उपचार संभव नहीं है। बीजोपचार ही रोगों से सुरक्षा का एक मात्र  टीका है। बीजोपचार नहीं करने वाले किसानों के चलते इन रोगों के प्रसार को साल दर साल कडंवा रोग को बढ़ावा मिल रहा है। गौरतलब है कि प्रदेश में 30-32 लाख हैक्टयर क्षेत्र में गेहूं की बुवाई होती है। डॉ. शेखावत ने बताया कि इन रोगों का प्रसार रोकने के लिए इन दिनों गेहूं- जौ की बुवाई में जुटे किसानों को बीजोपचार के बाद ही बीज की बुवाई करनी चाहिए। क्योंकि, गेहूं की बुवाई प्रदेश में बड़े क्षेत्रफल में की जाती है। यह कण्डवा रोग फसल के गुप्त शत्रु भी कहे जाते है। क्योंकि, रोगी पौधें का पता बालियां पकाव के समय चलता है। इस कारण किसान के पास रोगी पौधों को नष्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। वहीं, पीली रोली का नियंत्रण भी फसल की निगहबानी से ही संभव है। फसल की निगरानी नहीं करने की स्थिति में फसल को 60-70 फीसदी नुकसान संभव है। उनका कहना है कि पीली रोली रोग की रोकथाम के लिए प्रतिरोधी किस्मों का बीज किसानों को उपलब्ध करवाया जा रहा है। जागरूक किसान रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग भी कर रहे है। 


क्या है गेहूं का अनावृत कडंवा
डॉ. शेखावत ने बताया कि गेहूूं में होने वाले अनावृत कडंवा रोग को किसान कांग्या रोग भी कहते है। वहीं, वैज्ञानिक भाषा में इसे लूज स्मट रोग कहा जाता है। इस रोग में बाली के अंदर दानों की जगह कवक के काले बिजाणु भर जाते है। कवक के बिजाणु नाजुक झिल्ली से ढके रहते है। देखने में दाना पूरी तरह से स्वस्थ नजर आता है। लेकिन, बीज के भ्रूण में फंगस सुसुप्त अवस्था में कवक जाल के रूप में छिपा होता है। झिल्ली फटने पर कवक काले पाउडर के रूप में उडक़र स्वस्थ दानों को संक्रमित कर देता है। 


इन जिलों में पीली रोली 
उन्होंने बताया कि पिछले रबी सीजन में गेहूं की फसल निरीक्षण के दौरान दौसा, जयपुर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, झुंझुनूं , सीकर सहित प्रदेश के गेहूं उत्पादक जिलों में पीली रोली का प्रकोप देखने को मिला था। उन्होंने बताया कि इस रोग का प्रकोप जनवरी माह के अंतिम सप्ताह में देखने को मिलता है। रोग का पता लगाने के लिए किसान बताएं समयानुसार फसल का निरीक्षण करें। पेड़ो की छाया के नीचे वाली फसल में इस रोग के लक्षण देखने को मिल जाते है। उन्होंने बताया कि रोग नियंत्रण के अभाव में इस रोग से भी 60-70 फीसदी नुकसान संभव है। 


यह करें किसान
उन्होंने बताया कि गेहूं- जौ उत्पादक किसान बीजोपचार के लिए  टेबुकोनाजोल 2 प्रतिशत डीएस एक ग्राम दवा प्रति किग्रा बीज की दर से प्रयोग करें। यह दवा उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में किसान कोर्बोक्सिन+थायरम (1:1) 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से प्रयोग करें। 


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