हाड़ौती में फिर शुरू होगा गेहूं-जौ पर रिसर्च, किसानों को नई उम्मीद 

नई दिल्ली 24-Aug-2026 12:31 PM

हाड़ौती में फिर शुरू होगा गेहूं-जौ पर रिसर्च, किसानों को नई उम्मीद 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा
आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट की घोषणा

जयपुर। हाड़ौती संभाग के लिए खुशखबर सामने आई है। करीब दशक बाद हाड़ौती में गेहंू-जौ फसल पर फिर से रिसर्च शुरू होने की उम्मीद बंधी है। यदि समय पर घोषणा ने धरातल लिया तो इस संभाग के किसानों को ना केवल स्थानीय जलवायु में बेहत्तर पैदावार देने वाली गेहूं-जौ की नई किस्म मिलेगी। वहीं, नई उत्पादन तकनीक का भी लाभ मिलेगा। दरअसल, जयपुर में भारतीय गेहूं-जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के द्वारा आयोजित 65वीं वार्षिक समूह बैठक के दौरान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट ने कृषि विश्वविद्यालय कोटा को अखिल भारतीय गेहूं-जौ सुधार अनुसंधान परियोजना का सेंटर मंजूर करने का ऐलाना किया है। इससे विश्वविद्यालय के साथ-साथ किसानों को नई उम्मीद बंधी है। गौरतलब है कि हाड़ौती संभाग गेहूं के उत्पादन में प्रदेश में अग्रणी है। क्योंकि, यहां की मिट्टी-पानी गेहूं की खेती के लिए अनुकूल है। विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एमसी जैन ने बताया कि विश्वविद्यालय में गेहूं-जौ की फसल पर पहले भी रिसर्च होता था। लेकिन, कुछ कारणों के चलते रिसर्च कार्य बंद हो गया। अब आईसीएआर महानिदेशक डॉ. एमएल जाट की घोषणा से गेहूं-जौ में रिसर्च का मौका फिर मिलने जा रहा है। उन्होंने बताया कि नेटवर्क परियोजना के तहत होने वाले रिसर्च का पैसा और वैज्ञानिकों के नए पद आईसीएआर द्वारा मंजूर किए जाते है। इससे रोजगार की उम्मीद लगाएं बैठे कृषि बेरोजगारों को भी लाभ मिलेगा। वहीं, क्षेत्र के किसानों को स्थानीय जलवायु में तैयार होने वाली गेहूं किस्मों का लाभ मिलेगा। इस सेंटर के धरातल लेने के बाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को फोकस नई किस्मों के विकास और कम लागत वाली तकनीकी विकास पर रहेगा।

2017 में बंद हुआ था रिसर्च

बता दें कि कृषि विश्वविद्यालय कोटा पर वर्ष 2017 तक आईसीएआर नेटवर्क परियोजना के तहत गेहूं-जौ फसल पर रिसर्च होता रहा। लेकिन, बाद में नेटवर्क परियोजना को खत्म कर दिया गया। इससे रिसर्च कार्य भी बंद हो गया। 

साढे पांच लाख हैक्टयर में खेती

उन्होंने बताया कि हाड़ौती संभाग में करीब साढे पांच लाख हैक्टयर क्षेत्र में गेहूं का उत्पादन होता है। गेहूं उत्पादन के लिए जमीन अच्छी है। वहीं, पानी भी पर्याप्त है। इसके अलावा मौसमी दशाएं भी अनुकूल है। शायद यही कारण है कि प्रति हैक्टयर 50-60 क्विंटल तक औसत उपज किसानों को मिल जाती है।

गेहूं उत्पादन पर जोर

गौरतलब है कि आईसीएआर नेटवर्क परियोजना के तहत देश के कई सेंटरों पर पिछले कई दशकों से गेहूं रिसर्च के अच्छे परिणाम भी देखने को मिले हैं। इसके चलते रोगप्रतिरोधी नवीन गेहंू किस्में उत्पादन का नया रिकॉर्ड बना रही है। हर साल गेहूं के उत्पादन में बढौत्तरी दर्ज हो रही है।

किसानों की समस्या बनेगी शोध की दिशा

विश्वविद्यालय के कुलगुरू डॉ. विमला डूंकवाल ने कहा कि किसानों की समस्या ही विश्वविद्यालय के शोध एजेंडे का आधार बनेंगे। उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला तक सीमित शोध के बजाय खेत की जरूरत के अनुसार काम करना जरूरी है। इस सेंटर की घोषणा से परिणाम आधारित रिसर्च को प्रोत्साहन मिलेगा।

किसानों तक पहुंचेगा वैज्ञानिक समाधान

उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए विश्वविद्यालय लगातार काम करेगा। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक तकनीक को खेत तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया जाएगा।

9 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट मंजूर

उधर, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने विश्वविद्यालय के लिए 9 करोड़ का विशेष प्रोजेक्ट मंजूर किया है। इस परियोजना के तहत विश्वविद्यालय में स्वचालित बीज प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित किया जायेगा। कुलगुरु प्रो. विमला डुंकवाल के अनुसार प्रोजेक्ट के तहत विश्वविद्यालय परिसर में ऑटोमैटिक सीड प्लांट लगाया जाएगा। इसमें करीब 2.5 करोड़ की लागत से अत्याधुनिक ऑटोमैटिक मशीनें और 2.5 करोड़ रुपए की लागत से नया भवन बनाया जाएगा। यह प्लांट बनने के बाद विश्वविद्यालय के खेतों में तैयार उन्नत बीजों का सभी काम ऑटोमैटिक होगा। ऑटोमैटिक मशीन रंग के आधार पर बीजों की पहचान करेगी। गेहूं अथवा अन्य फसलों के काले और पकने से पहले हरे और बारीक हुए दानों को बीनकर बाहर निकाल देगी। प्लांट में 5 से 7 मशीनें एक कतार में लगातार काम करेंगी।


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