कैर से बनेगी हर्बल टी, पाउडर और औषधीय उत्पादों पर शोध
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। अचार तक सीमित रहने वाले कैर को अब दिल और मधुमेह सहित दूसरे रोगों के लिए संजीवनी बूटी बनाने की तैयारी हो रही है। क्योंकि, कैर प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फ ाइबर, विटामिन सी, बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहा, जिंक और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों से भरपूर खुराक है। गौरतलब है कि फास्टफू ड़ के इस दौर में कैर की उपयोगिता साबित करने के लिए जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय के पीएम-राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत एक पंचवर्षीय प्रोजेक्ट स्वीकृत हुआ है। इसके तहत कृषि वैज्ञानिक कैर के वैल्यूएडिशन के साथ-साथ श्ुाष्क क्षेत्रों में इसकी खेती को प्रोत्साहित करने का काम करेंगे। कैर की नई किस्मों का विकास किया जायेगा। साथ ही, ग्राफ्टेड़ पौधें तैयार करके किसानों को उपलब्ध कराएं जायेंगे। गौरतलब है पश्चिमी राजस्थान में सौर उर्जा प्रोजेक्ट और खेती के विस्तार के चलते पारस्थितिकी तंत्र को मजबूती देने वाला यह पौधा विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया है। विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एमएम सुंदरिया ने बताया कि यह पौधा वन्य जीवों के लिए आवास के साथ-साथ मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। इसके फल बहुपयोगी और पोषक तत्वों से भरपूर है। लेकिन, अब तक इसका उपयोग अचार तैयार करने तक ही सीमित है। जबकि, इसमें मौजूद पोषक तत्वों कई रोगों की दवा का काम कर सकते है। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट के तहत इसके मूल्यसंवद्र्धित उत्पाद तैयार किए जाने है। ताकि, रोग पीडि़तों के साथ-साथ किसानों को भी लाभ मिल सके। बता दें कि कैर में सूखा सहन करने की विशेष क्षमता रखता है। पर्यावरणीय दृष्टिकोण से यह पौधा मिट्टी के कटाव को रोकता है।
रखता है रोग प्रतिरोधी गुण
औषधीय दृष्टि से कैर के विभिन्न भाग जैसे तना, जड़, फल और फूल पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग किए जाते हैं। इसके तनों में कैंसर कोशिका-विनाशी गुण होते हैं। जबकि, फूल और फल सूजनरोधी, आरामदायक और दौरा रोधी होते हैं। वहीं छाल का उपयोग गठिया, दर्द, खांसी और अस्थमा जैसे रोगों में किया जाता रहा है। इसके अलावा पाचन क्षमता को भी बेहत्तर बनाता है।
तैयार होंगे पौधें
एआरएस मंड़ोर के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. एमएल मेहरिया ने बताया कि पश्चिमी जिलों में मानव-पशुधन और पर्यावरण के लिए कैर की उपयोगिता को बनाए रखने के लिए जर्मप्लाज्म का संग्रहण किया जाएंगा। ज्यादा फल देने वाले जर्मप्लाज्म पर शोध करके पौधें तैयार किए जायेंगे। साथ ही, किसानों को उपलब्ध कराएं जायेंगे। उन्होने जर्मप्लाज्म संग्रहण से नई किस्म विकास की संभावना भी बनेगी।
तैयार होगी हर्बल टी
प्रोजेक्ट के प्रभारी डॉ. मिथलेश कुमार ने बताया कि अचार तक सीमित रहने वाले कैर को बहुपयोगी बनाने के लिए वैल्यूएडिशन पर काम किया जाएगा। अचार के साथ-साथ सूखा पाउडऱ, हर्बल टी बनाने पर भी शोध किया जायेगा।
विलुप्ति का एक कारण यह भी
उन्होने बताया कि कैर के पौधें पर फरवरी-मार्च के दौरान फल लगते है। इसके 10 महीने तक पौधें में फलन नहीं होता। इस कारण यह पौधा अनुपयोगी बन जाता है। बता दें इसके फल का उपयोग सीधे तौर पर नहीं हो पाता है। क्योंकि, फल का स्वाद क सैला होता है। कसैलेपन को हटाने के लिए फलों को 5 प्रतिशत नमक के घोल में भिगोया जाता है। इसके बाद फल का उपयोग संभव होता है। गौरतलब है कि पंचकूटे की सब्जी कैर के बिना अधूरी मानी जाती है।
पीएम आरकेवीवाई योजना के तहत कैर पर पंचवर्षीय प्रोजेक्ट विश्वविद्यालय को मिला है। 205 लाख रूपए के इस प्रोजेक्ट के तहत है। कैर के वैल्यूएडिशन, खेती को प्रोत्साहित और नई किस्म विकास पर शोध किया जायेगा।
डॉ. वीएस जैतावत, कुलगुरू, एयू, जोधपुर