कभी मुनाफे की गारंटी थी पॉलीहाउस खेती, अब कीट-रोग से किसान परेशान 

नई दिल्ली 12-Oct-2026 01:35 PM

कभी मुनाफे की गारंटी थी पॉलीहाउस खेती, अब कीट-रोग से किसान परेशान 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा

जयपुर। डेढ़ दशक पहले जिस संरक्षित खेती को कम जमीन में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और ज्यादा मुनाफे का जरिया माना गया था। वही अब किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और मौसम में आ रहे उतार-चढ़ाव के बीच कीट- रोगों का बढ़ता प्रकोप किसानों की परेशानी बढ़ा रहा है। हालात ये हो चले है कि किसान पॉली हाउस उखाडऩे लगे है अथवा अपने पॉली हाउस को ऐसे एरिया में शिफ्ट कर रहे है, जहां दूर-दूर तक पॉली हाउस नहीं है। इस बात का अंदाजा मिनी इजराइल की नींव रखने वाले किसान खेमाराम चौधरी से लगाया जा सकता है। जिन्होंने अपने पॉली हाउस को टोंक जिले में शिफ्ट किया है। कमोबेश, ऐसे ही हालात प्रदेश के दूसरे जिलों में भी देखने को मिल रहे है। कृषि वैज्ञानिकों की माने तो संरक्षित खेती के हालात धीरे-धीरे कपास  में गुलाबी सुंड़ी जैसे बनते जा रह है। जबकि, संरक्षित खेती में सफेद मक्खी और थ्रिप्स कीट ने किसानों को पॉली हाउस खेती छोडऩे को मजबूर कर दिया है। किसानों का कहना है कि वर्ष 2015 तक फसल में कीट-रोग का आंशिक प्रकोप देखने को मिलता था। लेकिन, अब पौध रोपण के साथ ही कृषि रसायनों का छिडक़ाव करना पड़ रहा है। इससे कृषि लागत काफी बढ़ चुकी है। वहीं, बाजार में कृषि आदान के दाम दोगुने हो चुके है। जबकि, बाजार में खीरा फसल की रेट में कोई ज्यादा अंतर नहीं आया है। सर्दी की फसल में तो बाद वाली फसल को 5-10 रूपए प्रति किलो के रेट मिलते है। इससे मुनाफा मारा जाता है। इन हालात में किसान पॉलीहाउस में फसलें उगाने से तौबा करने लगे है। या फिर अपने पॉली हाउस को दूसरी जगह शिफ्ट कर रहे है। ताकि, बैंक ऋण का समय पर भुगतान किया जा सके। गौरतलब है कि सरकार ने संरक्षित संरचना पर अनुदान घटा दिया है। इससे किसानों पर पहले ही तुलना में आर्थिक भार बढ़ा है।

प्रबंधन बड़ी चुनौति

संरक्षित खेती को राजस्थान जैसे जलवायु की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण प्रदेश में किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम माना गया। सरकार की योजनाओं और अनुदान के सहारे किसानों ने इस तकनीक को अपनाया भी। लेकिन, बदलते हालातों में फसल का सुरक्षित उत्पादन लेना अब चुनौति बन चुका है। विशेषकर जब फसल में रोग लग जाएं या बाजार में उपज का अपेक्षित भाव नहीं मिले, तो किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

आसान नहीं नुकसान की भरपाई

नागौर जिले के किसान अशोक कुमार सैनी ने बताया कि पॉलीहाउस स्थापना का काम आसान है। लेकिन, फसल उत्पादन करना अपने में एक बड़ी चुनौति बन चुका है। शुरुआती निवेश अधिक होने के कारण नुकसान की भरपाई करना भी आसान नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने कर्ज, बढ़ते खर्च और घटते मुनाफे का संकट खड़ा हो रहा है। उनका कहना है कि कृषि  आदान मंहगा हो चुका है। 700-800 रूपए में मिलने वाला कैल्शियम का बैग वर्तमान में 2300 रूपए का मिल रहा है। यही स्थिति दूसरे आदानों की है। ऐसे में फसल की लागत बढ़ चुकी है। गर्मी की फसल के भाव अच्छे मिलते है। लेकिन, सर्दी वाली फसल के भाव में खेती घाटे को सौदा बन चुकी है।

कीट-रोगों ने बढ़ाई मुश्किल

जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान, आर्द्रता और मौसम के चक्र में होने वाले बदलाव ने फसल प्रबंधन को अधिक जटिल बना दिया है। अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर सफेद मक्खी, थ्रिप्स, माइट्स और अन्य कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते देर नहीं करते। गौरतलब है कि कई बार दवाओं पर खर्च बढऩे के बावजूद अपेक्षित नियंत्रण नहीं मिल पाता। इससे उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने का खतरा रहता है।

बढ गई उत्पादन लागत

एक ओर लागत में इजाफा हो रहा है, दूसरी ओर दवाओं के इस्तेमाल के बावजूद फसल को पूरा संरक्षण नहीं मिल पाना किसानों की चिंता बढ़ा रहा है। यदि बाजार में उपज का भाव भी कमजोर रहे, तो मुनाफे का गणित पूरी तरह बिगड़ जाता है।

पॉलीहाउस उखाडऩे की नौबत

संरक्षित खेती में बढ़ते खर्च और अनिश्चित आमदनी के बीच किसान तकनीक छोड़ रहे है तो सवाल केवल एक फसल या एक किसान के नुकसान का नहीं, बल्कि कृषि निवेश, तकनीकी विस्तार और किसानों की आय बढ़ाने के प्रयासों का भी है। किसान खेमाराम ने बताया कि वर्ष 2015 तक फसल में कीट-रोग का प्रकोप नगण्य था। लेकिन, अब हालात पूरी तरह बदल चुके है। बायो कंट्रोल प्रत्येक किसान के बूते से बाहर है।

कीट-रोग का बन चुके है घर

राष्ट्रीय समेकित नाशीजीवी प्रबंधन अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसएम हलधर ने बताया कि संरक्षित फसल के सुरक्षित उत्पादन के लिए आईपीएम तकनीक ही कारगर है। क्योंकि, रसायन की गुणवत्ता किसी से छिपी नहीं हैं। यह सही है कि सघन संरक्षित खेती से कीट-रोग का प्रकोप बढ़ रहा है। ऐसे में कृषि विश्वविद्यालयों को भी कीट-रोग निगरानी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है। 


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