राजस्थान में चने की फसल पर निमेटॉड का खतरा, 58% नमूनों में संक्रमण 

नई दिल्ली 26-Oct-2026 04:41 PM

राजस्थान में चने की फसल पर निमेटॉड का खतरा, 58% नमूनों में संक्रमण 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा

जयपुर। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में चने की खेती के लिए जड़-गांठ सूत्रकृमि नई चुनौती बनकर उभरा है। आठ जिलों में हुए व्यापक सर्वे में 58.27 प्रतिशत नमूनों में इसका प्रकोप मिला है। यानी चने की जड़ों में छिपकर नुकसान पहुंचाने वाला यह सूक्ष्म जीव बड़े इलाके में मौजूद है। चिंता इसलिए भी है कि परीक्षण की गई चने की 20 किस्मों और लाइनों में एक भी इसके प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी नहीं मिली। हालांकि, राहत की बात यह है कि प्राकृतिक खेती उत्पादों, जैव कारकों और वर्मीकम्पोस्ट के संयुक्त इस्तेमाल से संक्रमण घटाने और उपज बढ़ाने के उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं। राजस्थान कृषि महाविद्यालय के सूत्रकृमि विज्ञान विभाग की शोधकर्ता सीमा यादव ने चने को संक्रमित करने वाले जडग़ांठ सूत्रकृमि मेलॉइडोगाइन इनकॉग्निटा पर यह शोध किया। शोध का मकसद सूत्रकृमि के फैलाव और नुकसान का आकलन करने के साथ रासायनिक सूत्रकृमिनाशियों पर निर्भरता कम करने वाले प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल विकल्प तलाशना था। गौरतलब है कि प्रदेश में 18-20 लाख हैक्टयर क्षेत्र में चना फसल की बुवाई होती है। ऐसे में निमेटॉड की उभरती नई चुनौति ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। साथ ही, अब तक चना फसल पर हुए वैज्ञानिक शोध पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। क्योंकि, शोध में एक भी चना किस्म में प्रतिरोधकता नहीं मिलना, भविष्य में बड़े खतरे का संकेत दे रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि चने की खेती और उत्पादन बढ़ौत्तरी के लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों को निमेटॉङ प्रतिरोधी किस्मों के विकास पर भी फोकस करना होगा। नहीं तो परम्परागत फसलों की स्थिति भी संरक्षित खेती के जैसी होते ज्यादा समय नहीं लगेगा। गौरतलब है कि चना की फसल में सूत्रकृमियों के चलते 22-25 फीसदी तक नुकसान होता है। 

8 जिले, 74 स्थान और 532 नमूने

शोधार्थी सीमा यादव के तहत उदयपुर, सलूम्बर, प्रतापगढ, डूंगरपुर, टोंक, बूंदी, कोटा और बारां के 74 स्थानों से जड़ और मिट्टी के कुल 532 नमूने जुटाए गए। सर्वे में सूत्रकृमि की मौजूदगी 58.27 प्रतिशत रही। औसतन प्रति पौधा 53.10 जडगांठ और 42.77 अंडा द्रव्यमान मिला। जबकि, 200 सीसी मिट्टी में औसतन 558.75 सूत्रकृमि दर्ज किए गए।

नीम- ट्राइकोडर्मा के प्रयोग 

राजस्थान कृषि महाविद्यालय, बडग़ांव, बूझड़ा-उदयपुर और रारी-दुर्गापुरा में किए गए परीक्षणों में नीम बीज गिरी पाउडर के साथ ट्राइकोडर्मा विरिडी से समृद्ध वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग प्रभावी पाया गया। इसके इस्तेमाल से चने की उपज में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। शोध में सूत्रकृमि के कारण दाना और भूसा उत्पादन में भी नुकसान सामने आया।

पंचगव्य का बेहतर असर

प्राकृतिक खेती उत्पादों के परीक्षण में 12 प्रतिशत पंचगव्य से बीज उपचार और मेटारहिजियम एनिसोप्लिया से समृद्ध वर्मीकम्पोस्ट के मृदा उपचार वाले संयोजन से सर्वाधिक उपज प्राप्त हुई। इसके बाद जीवामृत और बीजामृत के साथ जैव कारक से समृद्ध वर्मीकम्पोस्ट के प्रयोग के बेहतर नतीजे मिले।

300 पीपीएम सबसे प्रभावी

प्रयोगशाला में अलग-अलग नैनोकणों को भी परखा गया। सूत्रकृमि के अंडों की हैचिंग कम करने और लार्वा मृत्यु दर बढ़ाने में कॉपर ऑक्साइड 300 पीपीएम सबसे प्रभावी रहा। इसके बाद जिंक ऑक्साइड 300 पीपीएम और कॉपर ऑक्साइड 200 पीपीएम का असर पाया गया। नैनोकणों से बीज उपचार के प्रयोग में भी कॉपर ऑक्साइड 300 पीपीएम वाले उपचार से सर्वाधिक उपज मिली।

20 किस्में जांचीं, एक भी प्रतिरोधी नहीं

शोध में चने की 20 किस्मों और लाइनों की जड-गांठ सूत्रकृमि के खिलाफ  प्रतिरोधक क्षमता जांची गई। कोई भी किस्म प्रतिरोधी अथवा अत्यधिक प्रतिरोधी नहीं मिली। हालांकि आरएसजी-895, आरएसजी-963 और जीएनजी-2144 मध्यम प्रतिरोधी पाई गईं। यह नतीजा सूत्रकृमि प्रतिरोधी किस्मों के विकास की जरूरत को भी रेखांकित करता है।

किसानों को क्या फायदा

डॉ. बीएल बाहेती ने बताया कि यह नतीजे किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जड़ गांठ सूत्रकृमि के नियंत्रण में रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटाने की संभावनाएं सामने आई हैं। नीम बीज गिरी, पंचगव्य, जीवामृत, बीजामृत और जैव कारकों से समृद्ध वर्मीकम्पोस्ट जैसे उपायों के समन्वित प्रयोग से संक्रमण कम करने और उपज बढ़ाने के परिणाम मिले हैं। इससे कम रसायन आधारित और पर्यावरण अनुकूल सूत्रकृमि प्रबंधन की दिशा में विकल्प मिल सकते हैं। खेत में इनका उपयोग स्थानीय परिस्थितियों और कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के अनुसार किया जाना चाहिए। 


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