धान के बाद खाली नहीं रहेगा खेत, ब्राह्मी की नई किस्म मंजूर
(सभी तस्वीरें- हलधर)पीयूष शर्मा
जयपुर। नागौरी अश्वगंधा को जीआई टैग दिलाने के बाद आईसीएआर- औषधीय- सुगंधित पौधें अनुसंधान निदेशालय, आणंद से एक ओर खुशखबरी निकलकर सामने आई है। लंबे रिसर्च के बाद वैज्ञानिको ने जल ब्राह्मी की ऐसी किस्म का विकास किया है, जो नदी क्षेत्र, पहाड़ी और जलभराव क्षेत्र वाले किसानों के लिए वरदान साबित होगी। साथ ही, धान की कटाई के बाद किसानों को खेत खाली छोडऩे की जरूरत नहीं रहेगी। गौरतलब है कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित जल ब्राह्मी की नव विकसित किस्म को वल्लभ गंगा ब्राह्मी-1 (डीबीएम-4) नाम दिया गया है। इस किस्म को केंद्रीय किस्म विमोचन समिति से हाल ही में मंजूरी मिली है। यह किस्म बैकोसाइड ए-3 और बैकोसाइड-एक्स की उच्च मात्रा के साथ सूखी जड़ी-बूटी की पैदावार के मामले में भी बेहतर पाई गई है। इस किस्म से बैकोसाइड उत्पादन 181.17 किलोग्राम प्रति हैक्टयर दर्ज किया गया है, जो चेक किस्म सीआईएम-जागृति के 114.68 किलोग्राम प्रति हैक्टयर उत्पादन से लगभग 57.98 प्रतिशत अधिक है। गौरतलब है कि इस किस्म का विकास डा. परमेश्वरलाल सारन की टीम ने किया है। वल्लभ गंगा ब्राह्मी-1 की सबसे बड़ी विशेषता इसमें बैकोसाइड ए 3 और बैकोसाइड एक्स की अधिक मात्रा का पाया जाना है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस किस्म में बैकोसाइड ए 3 की मात्रा 0.605 प्रतिशत और बैकोसाइड एक्स की मात्रा 0.715 प्रतिशत है। इन प्रमुख घटकों की उच्च मात्रा इसे गुणवत्ता की दृष्टि से विशिष्ट बनाती है। इसके साथ ही कुल बैकोसाइड उत्पादन में भी इस किस्म ने चेक किस्म की तुलना में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की है। कुल बैकोसाइड उत्पादन का आंकड़ा बताता है कि वल्लभ गंगा ब्राह्मी-1 प्रति हैक्टयर अधिक मात्रा में बैकोसाइड उपलब्ध कराने की क्षमता रखती है। इससे औषधीय पौधों की खेती में गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को ध्यान में रखने वाले किसानों के लिए यह एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकती है।
सूखी जड़ी-बूटी की अच्छी पैदावार
उत्पादन के मामले में भी वल्लभ गंगा ब्राह्मी-1 ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इसकी सूखी जड़ी-बूटी की पैदावार 134 क्विंटल प्रति हैक्टयर दर्ज की गई है। जबकि चेक किस्म सीआईएम-जागृति की पैदावार 124 क्विंटल प्रति हैक्टयर है। इस प्रकार नई किस्म की पैदावार चेक किस्म से लगभग 8.52 प्रतिशत अधिक है।
नई किस्म की विशेषता
पत्तियों और तने की अलग पहचान
वल्लभ गंगा ब्राह्मी-1 की पहचान केवल इसकी उपज और रासायनिक गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। इस किस्म की पत्ती का आकार 1.25 वर्ग सेंटीमीटर दर्ज किया गया है। इसके फूल के डंठल यानी पेडिसल की अधिकतम लंबाई 2.96 सेंटीमीटर है, जो मध्यम से बड़े आकार की श्रेणी में आती है। इस किस्म में प्रति वर्ग मीटर स्टोलन (भूमि पर फैलने वाले तने) की अधिकतम संख्या 2388.67 दर्ज की गई है। ये विशेषताएं इसे अन्य किस्मों से अलग पहचान देती हैं।
धान उत्पादकों को फायदा
नदी आधारित विशिष्ट कृषि-पारिस्थितिकी में वल्लभ गंगा ब्राह्मी-1 को किसानों के लिए बेहत्तर विकल्प साबित होगी। डॉ. सारण ने बताया कि कम ऊंचाई वाले इलाको में भी इसकी खेती संभव होगी। वहीं, धान की खेती करने वाले किसानों के लिए भी यह एक वैकल्पिक फसल के रूप में उपयोगी होगी।
यहां होगी है ब्राह्मी की खेती
देश में ब्राह्मी की खेती सीमित स्तर पर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की तलहटी वाले क्षेत्रों में की जाती रही है। गुजरात के आणंद जिले के पांडोरी गांव में भी इसकी खेती का उदाहरण सामने आया है। यहां निचले और जलभराव की समस्या वाले खेतों में किसानों ने ब्राह्मी को वैकल्पिक फसल के रूप में अपनाया है। गुजरात में इसे पॉलीहाउस और नेट हाउस जैसी संरक्षित परिस्थितियों में भी उगाने की संभावना दर्ज की गई है।
साल में 3-4 कटाई
ब्राह्मी एक बहुवर्षीय पौधा है। इसलिए अनुकूल परिस्थितियों में इसकी फसल को दोबारा बढऩे दिया जा सकता है। उन्होंने बताया कि एक बाद पौध लगाने के बाद साल भर में किसान को 3-4 कटाई मिल जाती है। बता दे कि ब्राह्मी की खेती मुख्य रूप से तने की कलमों और जमीन पर फैलने वाले रेंगते तनों (स्टोलन) से की जाती है। लगभग 4 से 6 सेंटीमीटर लंबी कलमों को रोपण सामग्री के रूप में तैयार किया जा सकता है। उत्तर भारत में इसे सामान्यत: गर्मी और वर्षा के मौसम की फसल के रूप में उगाया जाता है। जबकि, दक्षिण और मध्य भारत की अनुकूल परिस्थितियों में सालभर इसकी खेती संभव है।