गेहूं कटाई के बाद खेतों में भेड़-बकरियों को न चरने दें पशुपालक, वरना...
गेहूं कटाई के बाद खेतों में भेड़-बकरियों को न चरने दें पशुपालक, वरना...
(सभी तस्वीरें- हलधर)देश के कई इलाकों में इनदिनों गेहूं की कटाई शुरू हो गई है। कृषि में भले ही आज आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन गेहूं की कटाई के लिए कई हिस्सों में अब भी हाथ से फसल काटने की परंपरा बरकरार है। फसल की कटाई चाहे मशीन से हो या हाथ से, पकी फसल से गिरकर कुछ दाने खेतों में रह ही जाते हैं, जिन्हें बाद में पशु चरते हैं। यही कारण है कि कई पशुपालक फसल कटाई के बाद खाली खेतों में अपने पशु, खासकर भेड़ और बकरियों को चरने के लिए छोड़ देते हैं।
अधिक चराई से बढ़ता है बीमारी का खतरा
पशु विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं कटाई के बाद खेतों में दिनभर भेड़ों का चरना जितना लाभदायक दिखता है, उतना ही नुकसानदायक भी साबित हो सकता है। खासतौर पर भेड़ों में एंटरोटॉक्सिमिया (Enterotoxemia) नामक खतरनाक बीमारी अत्यधिक भोजन यानी ओवरईटिंग के कारण हो जाती है। खेतों में फसल के अवशेष या मानसून के दौरान हरा चारा मिलने पर भेड़ें जरूरत से ज्यादा खा लेती हैं। चूंकि झुंड में अक्सर सैकड़ों भेड़ें एक साथ चरती हैं, इसलिए हर भेड़ पर नजर रखना भी मुश्किल हो जाता है।
ऐसे फैलती है एंटरोटॉक्सिमिया बीमारी
भेड़ विशेषज्ञ के अनुसार, जब भेड़ों की आंत में एंटरोटॉक्सिमिया पैदा करने वाला बैक्टीरिया पनपता है, तो सबसे पहले भेड़ को दस्त लगते हैं। कुछ समय बाद दस्त अचानक बंद हो जाते हैं, लेकिन दो दिन के भीतर भेड़ में अत्यधिक कमजोरी आ जाती है। वह ठीक से चल नहीं पाती और अक्सर लड़खड़ा कर गिर जाती है। इसके बाद दोबारा दस्त होते हैं और कई बार दस्त के साथ खून भी आने लगता है। ऐसी स्थिति में कुछ ही समय में भेड़ की मौत हो सकती है।
बीमारी से बचाव का एकमात्र तरीका टीकाकरण
विशेषज्ञों का कहना है कि एंटरोटॉक्सिमिया का इलाज संभव नहीं होता, इससे बचाव के लिए केवल समय पर टीकाकरण ही सबसे प्रभावी उपाय है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि टीका केवल स्वस्थ भेड़ों को ही लगाया जा सकता है। यदि भेड़ पहले से ही इस बैक्टीरिया की चपेट में आ जाए, तो उसे ठीक करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
भेड़ों को चराने से पहले अपनाएं ये जरूरी उपाय
पशु विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार, जब भी भेड़ों के झुंड को चराने के लिए बाहर ले जाएं, तो पहले उन्हें सूखा चारा और मिनरल्स जरूर खिलाएं। सूखा चारा खिलाने से हरे चारे में मौजूद अधिक नमी का असर कम हो जाता है। सूखे चारे के रूप में भूसा दिया जा सकता है, जबकि मिनरल्स के तौर पर खल, बिनौले और चने की चूनी देना लाभकारी माना जाता है। इससे भेड़ों का पाचन संतुलित रहता है और बीमारी का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।