7 साल में 45 बीघा को बनाया जैविक
(सभी तस्वीरें- हलधर)प्रह्लाद नागर खेतों को लाभकारी बनाने के लिए किसानों को जैविक के साथ-साथ प्रसंस्करण की राह भी पकडऩी होगी। तभी खेती का सफर सुगम हो पायेगा। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है किसान प्रह्लाद नागर ने। जो सात साल के दौरान 45 बीघा जमीन को जैविक के दायरे में ला चुके है। साथ ही, तिलहन और दलहनी फसलों का मूल्यसंवद्र्धन करके अपनी आमदनी बढ़ा रहे है। उन्होंने बताया कि प्रसंस्करण और मूल्य संवद्र्धन से उपज का दोगुना भाव मिल रहा है। वहीं, प्राकृतिक आदन उपयोग से मृदा-पोषण सुधार के साथ-साथ कृषि लागत में गिरावट दर्ज हुई है। मोबाइल 86194-99906
भवानीपुरा, बूंदी। प्राकृतिक तरीके से प्रकृति ही नहीं, मृदा और पोषण को सुधारने वाले किसान है प्रह्लाद नागर। जो 45 बीघा जमीन को प्राकृतिक आदानों के बलबूते जैविक में तब्दील कर चुके है। साथ ही, प्रसंस्करण की राह भी पकड़ चुके है। इससे नागर के खेतों में उत्पादित गेहूं 6 हजार रूपए प्रति क्विंटल तो दाल 200 और गुड 100 रूपए प्रति किलो के भाव से बिक्री हो रहा है। गौरतलब है कि किसान प्रह्लाद ने सात साल पहले जैविक का सफर शुरू किया था। उन्होने कहा कि जैविक अपनाने उत्पादन में गिरावट नहीं आई। बल्कि, मुनाफा बढ़ा है। सारा खर्च निकालने के बाद 8-10 लाख रूपए की सालाना बचत मिलने लगी है। किसान प्रह्लाद ने हलधर टाइम्स को बताया कि हम 6 भाईयों के मध्य 60 बीघा कृषि भूमि है। संयुक्त परिवार होने के चलते सभी सदस्य खेती से जुड़ी अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभा रहे है। उन्होने बताया कि सात साल पहले तक मैं भी क्षेत्र के दूसरे किसानों के जैसे रासायनिक ख्ेाती करता था। लेकिन, एक अभ्यास वर्ग के दौरान मुझे जैविक और प्राकृतिक खेती के फायदें जानने को मिले तो खेतों को जैविक बनाने का प्रण कर लिया। उन्होंने बताया कि शुरूआत में थोड़ी दिक्कत जरूर हुई। लेकिन, अब 45 बीघा जमीन जैविक के दायरे में आ चुकी है। इससे मृदा में कार्बन की बढौत्तरी हुई है। उन्होने बताया कि परम्परागत फसलों में गन्ना, गेहूंू, मक्का, उड़द, मूंग, सरसों, तिल, मसूर, चना और धान फसल का उत्पादन लेता हॅू।
प्रसंस्करण से ज्यादा लाभ
उन्होंने बताया कि जैविक से लागत घटाने के साथ मुनाफा बढ़ाने के लिए मैने प्रसंस्करण और मूल्यसंवद्र्धन पर भी फोकस किया। खेत में उत्पादित सरसों से तेल और दलहनी फसलों से दाल तैयार करना शुरू किया है। इसी तरह धान फसल से भी चावल तैयार करके बिक्री करना शुरू किया। परिणाम रहा है कि अब गेहूं 6 हजार रूपए प्रति क्विंटल, दाले 200, तो गुड 100 रूपए प्रति किलो के भाव से बिक्री हो रहा है। इससे सालाना बचत का आंकड़ा 8-10 लाख रूपए तक पहुंच चुका है। इन्होंने उपज के लिए बूंदी में एक बिक्री केन्द्र स्थापित किया है। गौरतलब है कि नागर हल्दी और अरबी के साथ-साथ घरेलू उपभोग के लिए सब्जी फसलों का भी उत्पादन ले रहे हे।
गौवंश आधारित आदान
नागर गौवंश आधारित आदान जैसे कम्पोस्ट, जीवामृत, पंचगव्य, वर्मी वाश, फल अपशिष्ट] सूक्ष्म पोषक तत्व घोल, वानस्पतिक काड़ा का प्रयोग पौध संरक्षण कार्य में कर रहे है। इससे ना केवल कृषि आदान का खर्च घटा है। बल्कि, फसल उत्पादन के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य में भी बढौत्तरी दर्ज हुई है।
उन्नत पशुपालन
पशुधन में मेरे पास 13 गाय और 7 भैस और एक जोड़ी बैल की है। उन्होने बताया कि प्रतिदिन 12-15 लीटर दुग्ध का उत्पादन मिल रहा है। परिवार संयुक्त होने के चलते दुग्ध की बिक्री नहीं करता हॅू। शेष रहने वाला दुग्ध घी बनाने का काम आ जाता है। वहीं, छाछ का उपयोग पशुधन के साथ-साथ जैविक आदान बनाने में करता हॅू।
स्टोरी इनपुट: डॉ. एस. राम रूण्डला, डॉ. नीरज हाड़ा, डॉ. इंद्रा यादव, डॉ. हरिश वर्मा, डॉ. दीपक कुमार, केवीके, बूंदी