9 बीघा से ढ़ाई लाख, सब्जी में डेढ़ बीघा से लाख
(सभी तस्वीरें- हलधर)
भीलवाड़ा़। फसल का गणित समझ आने के बाद खेती के बारे में किसानों की राय बदलते देर नहीं लगती है। ऐसा ही अनुभव ले रहा है किसान रतनलाल कुमावत। उनका कहना है कि किसान के लिए सब्जी फसल लाभकारी है। क्योंकि, मुझे डेढ बीघा जमीन से लाख रूपए की बचत आसानी से मिल जाती है। जबकि, 9 बीघा जमीन से सालाना दो से ढ़ाई लाख रूपए की आमदनी मिलती है। ऐसे में फर्क आसानी से समझा जा सकता है। किसान रामरतन ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास साढ़े दस बीघा जमीन है। 9वीं पास करने के साथ ही पढ़ाई छोड़ दी। रोजी-रोटी के लिए एक प्राइवेट कंपनी में 6 साल काम किया। लेकिन, बाद में खेती से जुड़ गया। परिणाम रहा है कि अब नौकरी से ज्यादा कमा रहा हॅू। साथ ही, समय के साथ खेती का ढर्रा बदलने में जुटा हुआ हॅू। उन्होंने बताया कि नौकरी छोडने के बाद पहले तो परम्परागत फसलो का उत्पादन लेता रहा। लेकिन, बाद में बारानी कृषि अनुसंधान केन्द्र, आरजिया के कृषि वैज्ञानिकों से सम्पर्क हुआ। उनके मार्गदर्शन में आय बढाने के प्रयास शुरू किए और सफल भी रहा। उन्होंने बताया सिंचाई के लिए दो कुएं और एक ट्यूबवैल् है। जब बचत के लिए फव्वारा सिंचाई का उपयोग कर रहा हॅू। उन्होंने बताया कि परम्परागत फसलों में मक्का, मूंगफली, चना, जौ, मैथी का उत्पादन लेता हॅॅू। इन फसलों से सालाना दो से ढ़ाई लाख रूपए की आय मिल जाती है।

डेढ़ बीघा में सब्जी
उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक मार्गदर्शन में सब्जी फसलों का उत्पादन लेना शुरू किया। शुरूआत आधा बीघा जमीन से हुई। लेकिन, मुनाफा अच्छा मिला तो सब्जी फसल का दायरा बढ़ाने लगा। वर्तमान में डेढ़ बीघा क्षेत्र में शकरकंद, मिर्च, टमाटर, तुरई आदि फसलो का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलों से सारा खर्च निकालने के बाद लाख रूपए की बचत मिल जाती है।
बागवानी से लाख
उन्होंने बताया कि सब्जी उत्पादन में सफल रहने के बाद बागवानी फसलो का भी रूख किया। सात साल पहले एक मिश्रित बगीचा स्थापित किया। जिसमें अनार, अमरूद, नींबू, बेर, करौंदा, सीताफल के पौधें लगाए। उन्होंने बताया कि सभी फसलों से अच्छी आमदनी मिल रही है। एक बीघा क्षेत्र में लगाएं बगीचे से सालाना लाख रूपए की आय मिल जाती है।
घी से पशुधन का खर्च
उन्होंने बताया कि पशुधन में मेरे पास दो गाय और दो भैंस है। प्रतिदिन 8 से 10 लीटर दुग्ध का उत्पादन हो रहा है। उन्होने बताया कि घरेलू आवश्यकता पूर्ति के बाद शेष रहने वाले दुग्ध से घी तैयार करता हॅू। घी उत्पादन से सालाना 50 से 60 हजार रूपए की आमदनी मिल जाती है। इससे पशुधन का खर्च निकल जाता है। वहीं, पशु अपशिष्ट खेतों मेें काम आ जाता है।
स्टोरी इनपुट: डॉ. केसी नागर, हिमांशु कुलदीप, मयंक गोयल, डॉ. एलके छाता, बारानी कृषि अनुसंधान केन्द्र, आरजिया, भीलवाड़ा