जैसलमेर से सीखा हुनर, भीलवाड़ा में लिखी खजूर की सफलता की कहानी
(सभी तस्वीरें- हलधर)
दडावाट, भीलवाड़ा। जीवन बदलने का आईडिया कब कहां मिल जाएं, कुछ नहीं कहा जा सकता। किसान सुवालाल कुमावत भी जैसलमेर घूमने गए थे। लेकिन, यहां पर खजूर उत्कृष्टता केन्द्र नजर आ गया। फिर क्या, अंदर एक जुनून पैदा हो गया। मैं क्यों खजूर की खेती नहीं कर सकता। इसी जुनून को पूरा करने की चाह में डेढ़ बीघा जमीन में खजूर का बगीचा स्थापित कर दिया। यह भीलवाड़ा जिले का पहला खजूर बगीचा है, जिसे किसान सुवालाल ने अपने हौंसले और बिना किसी सरकारी सहायता के स्थापित किया है। गौरतलब है कि किसान सुवालाल को खेती से सालाना तीन से साढे तीन लाख रूपए की आमदनी मिल रही है। किसान सुवालाल ने हलधर टाइम्स को बताया कि 10वीं में असफल रहने के बाद से खेती से जुड़ा हुआ हॅू। उन्होंने बताया कि पहले खेती से ज्यादा आमदनी नहीं मिलती थी। परिवार का खर्च चलाने के लिए स्टील बर्तन का काम भी शुरू कर दिया। इस तरह परिवार की रहगुजर चलती रही। उन्होंने बताय कि मेरे पास 12 बीघा जमीन है। सिंचाई के लिए कुआं है और जुगाड़ सिस्टम से ड्रिप लगाई हुई है। उन्होंने बताया कि ढ़ाई साल पहले जैसलमेर घूमने के लिए गया था। इस दौरान मुझे खजूर का उत्कृष्टता केन्द्र जाने का मौका मिला। वहां पर खजूर की विभिन्न किस्मों के पौधों के बारे में जानकारी मिली। गांव लौटकर सोचा कि खजूर की खेती यहां भी हो सकती है। उद्यान विभाग से जानकारी जुटाई तो पता चला कि खजूर की खेती पर जिले के किसानों को कोई अनुदान नहीं मिलता है। इससे हौंसला जरूर कम हुआ। लेकिन, कुछ नया करने का जुनून बना रहा। जैसे-तैसे पैसों का जुगाड़ करके पौधों की खरीद की और बगीचा स्थापित कर दिया। उन्होंने बताया कि परम्परागत फसलों में गेहूं, मक्का, ज्वार और बाजरे का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलों से खर्च निकालने के बाद डेढ़ लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है।
लगाए 5 किस्मों के पौधें
उन्होंने बताया कि 25 गुना 25 फिट पर डेढ़ बीघा क्षेत्र में खजूर के 80 पौधेें लगाए है। इन पौधों के मध्य वर्तमान में मक्का फसल का उत्पादन ले रहा हॅू। उन्होंने बताया कि खजूर किस्मों में खुनेजी, बरही, मेडजूल और हलावी शामिल है। पौधें दो साल के हो चुके है। इन दिनों पौधों पर शुरूआती फल लगे हुए है। इससे बेहत्तर आमदनी की उम्मीद बंध चुकी है।
एक बीघा में सब्जी उत्पादन
उन्होंने बताया कि बाजार की मांग को देखते हुए एक बीघा क्षेत्र में मिर्च की बुवाई कर देता हॅू। इससे भाव अच्छे रहने की स्थिति में सालाना डेढ़ से दो लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है। वहीं, पशुधन के लिए मैथी की बुवाई भी करता हॅू।
पशुपालन से आय
मेरे पास पशुधन में 3 भैंस और एक गाय है। प्रतिदिन 8-10 लीटर दुग्ध का उत्पादन होता है। उत्पादित दुग्ध घर में ही काम आ जाता है। परिवार की आवश्यकता पूर्ति के बाद शेष रहने वाले दुग्ध से घी तैयार कर लेता हॅू। इससे पशुधन का खर्च निकल जाता है। पशु अपशिष्ट से कम्पोस्ट खाद तैयार कर रहा हॅू।
स्टोरी इनपुट: प्रभुलाल जाट, उषा मीणा, कृषि विभाग, गुलाबपुरा