150 पौधे निकले बेकार, फिर भी खजूर की खेती से हुई शानदार कमाई
(सभी तस्वीरें- हलधर)
किशनपुरा, श्रीगंगानगर। खजूर के पौधें बांझ निकल गए। लेकिन, फिर भी खजूर की खेती लाभकारी बनी हुई है। बगीचे से मेहनत के आधार पर फल मिल रहे है। यह कहना है किसान रघुवीर सहारण का। जो डेढ़ दशक से खजूर की खेती से जुड़े हुए है। उनका कहना है कि बगीचा लगाने के बाद आमदनी जरूर बढ़ी है। लेकिन, आशातीत उत्पादन नहीं मिला। बता दें कि खजूर और परम्परागत फसल उत्पादन से किसान रघुवीर को सालाना 10 लाख रूपए की आमदनी मिल रही है। किसान रघुवीर ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास 65 बीघा जमीन है। परिजनों के खेती संभालने तक पढ़ाई की। लेकिन, स्नातकोत्तर करने के बाद मैने खेती को ही आजीविका का साधन बना लिया। क्योंकि, इस विरासत को संभालना ही किसान परिवार के होनहारों के लिए बड़ी नौकरी होती है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010-11 के दौरान सरकार के प्रोत्साहन पर खजूर का बगीचा स्थापित किया। मेडजूल, खलास, बरही, खुनेजी आदि किस्मों के पौधें बगीचे में लगाएं। लेकिन, जब उत्पादन मिलने और बगीचे से लाभ लेने का समय आया तो मन को बड़ा धक्का लगा। क्योंकि, 150 पौधें बांझ निकल गए। लेकिन, फिर भी मैने पौधें नष्ट नहीं किए। उन्होंने बताया कि जो पौधें बचे है, उन पर मेहनत के अनुसार उत्पादन मिल जाता है। उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए मेरे पास ट्यूबवैल है। परम्परागत फसलों में गेहूं, चना, सरसों, ग्वार, नरमा और बाजरे का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलों से सालाना पांच लाख रूपए की आय मिल जाती है। े
साढे 16 बीघा में खजूर
उन्होंने बताया कि बगीचा 15 साल को हो चुका है। पौधों से पांच साल बाद शुरूआती उत्पादन मिलना शुरू हुआ। इसके बाद पौधों से उत्पादन का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। साथ ही, आय का आंकड़ा भी। फसल से खर्च निकालने के बाद पांच लाख रूपए की आय मिल जाती। इस साल उत्पादन ज्यादा आय है तो आय का आंकड़ा बढऩा तय है।
दुग्ध से तैयार करते है घी
उन्होंने बताया कि पशुधन में मेरे पास आधा दर्जन गाय है। प्रतिदिन 10-15 लीटर दुग्ध का उत्पादन होता है। परिवार में सदस्यों की संख्या ज्यादा होने से दुग्ध की बिक्री नहीं करता हॅू। जो भी दुग्ध शेष रहता है, उससे घी तैयार कर लेता हॅू। इससे पशुधन का खर्च निकल जाता है। वहीं, पशु अपशिष्ट से खाद तैयार करके उपयोग में ले रहा हॅू।