दादा-पापा अखबार छापते रहे, पोते ने बदली खेतों की तस्वीर

नई दिल्ली 19-Dec-2025 02:43 PM

दादा-पापा अखबार छापते रहे, पोते ने बदली खेतों की तस्वीर

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पाडलिया, कोटा। परिवार के बड़े अखबार छापते रहे और छोटो ने उन्हें खेती विरासत में दें दी। सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा। लेकिन, सच से इंकार कैसा। दरअसल, परिवार के बड़ो को जैविक-प्राकृतिक खेती की सुनहरी तस्वीर दिखाने वाले वाले दो सखा है हर्षित और सन्मय जैन। जो पढ़ाई के साथ-साथ खेतों को काढ़ा पिला रहे है। साथ ही, सब्जी उत्पादन से सालाना 8 से 10 लाख रूपए का शुद्ध मुनाफा कमा रहे है। गौरतलब है कि हर्षित जैन बायोटेक्नोलॉजी से बीटेक और सन्मय सीए इंटर में है। लेकिन, खेती के लिए उनका जुनून परिवार के साथ-साथ कृषि अधिकारियों को भी सोचने को मजबूर किए हुए है। हर्षित ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास 25 बीघा जमीन है। लेकिन, दादा और पापा ने कभी खेती पर ध्यान नहीं दिया। उनका जुड़ाव अखबार से रहा। इस कारण जमीन बेकार पड़ी थी। खेती से एक पैसे की आय नहीं होती थी। इस स्थिति को देखते हुए पढ़ाई के दौरान खेती में कुछ नया करने का विचार आया और सन्मय मेरे साथ आ गया। इससे थोड़ा हौंसला बढ़ा और उद्यानिकी विभाग कोटा से बागवानी का ककहरा पढऩा शुरू किया। परिणा रहा है कि अब हम दोनों के परिवार वाले हमारी मेहनत और सोच की सराहना कर रहे है। उन्होंने बताया कि जमीन पूरी तरह स्वस्थ थी। इस कारण जैविक और प्राकृतिक के बढते रूझान को देखते हुए हमने रसायन से शुरू से ही दूरी बना ली। खेत में वानस्पतिक काढ़े और दूसरे जैविक आदानों की इकाई स्थापित की और लग गए अपने सपने को धरातल देने में। इसी का परिणाम है कि बंजर से दिखने वाले खेत अब हरियाली का चादर ओढ़ चुके है। साथ ही, लाखों रूपए की आय भी देने लगे है। उन्होने बताया कि हमारा प्रयास खेतों कों एग्री टूरिज्म की शक्ल देना है। उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए ट्यूबवैल है। सिंचाई के लिए बूंद-बूंद सिंचाई का उपयोग कर रहा हॅू। शायद यही कारण है कि कोटा जिले में सखी एग्रोटेक तेजी से अपनी पहचान बना रहा है।

10 एकड़ में सब्जी

उन्होंने बताया कि सब्जी फसलो में तरबूज, खरबूज, टमाटर, भिंड़ी, चुकंदर, पालक, परपल पत्ता गोभी और ब्रोकली की खेती कर रहा हॅू। उन्होंने बताया कि बाजार में जैविक सब्जियों की पहचान बन चुकी है। उन्होंने बताया कि पढ़ाई के साथ-साथ जैविक-प्राकृतिक खेती का अनुभव दिलीय उत्साह को बढ़ा रहा है। साथ ही, सालाना 8 से 10 लाख रूपए का शुद्ध लाभ भी दे रहा है। वहीं, कृषि मजदूरों को भी रोजगार मिल रहा है।

लगाया बगीचा

उन्होंने बताया कि सब्जी उत्पादन में सफलता को देखते हुए अब टिकाऊ आय के लिए बागवानी का रूख किया है। खेत में नींबू के साढे तीन सौ, ताइवान पिंक अमरूद के 300 और आम किस्म दशहरी, तोतापुरी, आम्रपाली और लंगडा किस्म के पौधें लगाए है। इसके अलावा प्रयोग के तौर पर शहतूत, सीताफल, कटहल, नीम और जामुन के दर्जन-दर्जन पौधें लगाए है। उन्होंने बताया कि बगीचा स्थापना को अभी 6 महीने हुए है।

खेत पर तैयार कर रहे है जैव आदान

उन्होंने बताया कि फसल में बीजोपचार, कीट-रोग नियंत्रण के काम आने वाले सभी जैव उत्पादन खेत पर ही तैयार कर रहा हॅू। इसके लिए अलग से इकाई स्थापित की हुई है। उन्होंने बताया कि फल मक्खी, सफेद मक्खी, हरा तेला और थ्रिप्स आदि कीट पतंगों का जैविक विधियों से समेकित प्रबंधन जैसे येलो स्टिक कार्ड, ब्लू स्टिक कार्ड, फेरोमेन ट्रैप का उपयोग कर रहा हॅू। उन्होने बताया जैव आदान तैयार करने के लिए खेत पर तीन गाय रखी हुई है। दुग्ध मजदूरों के चाय-पानी में काम आ जाता है। वहीं, पशु अशिष्ट से जैविक आदान तैयार हो रहे है।

स्टोरी इनपुट: एनबी मालव, उपनिदेशक, उद्यान, कोटा


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कहते है कि परिवार के आर्थिक हालात ठीक नही हो तो सफलता के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। किसान औंकारमल मेघवाल के साथ भी यही हुआ है। औंकार ने बताया कि पहले खेतों से पैदावार कम मिलती थी। इससे परिवार का खर्च निकालना भी मुश्किल लगता था। मजबूरी में रोटी-रोटी की तलाश ने मुझे दुबई पहुंचा दिया। आठ साल में जो कमाया, यहां लौटकर खेतों में निवेश किया। इसी का परिणाम है कि अब खेतों से 10-12 लाख रूपए सालाना की आमदनी मिल रही है। गौरतलब है कि किसान औकारमल डेढ़ दशक से सब्जी फसलो की खेती कर रहे है। साथ ही, इन्होने प्रति बीघा परम्परागत फसलों का उत्पादन बढ़ाने में भी सफलता पाई है। मोबाइल 9983231901