डेनमार्क रिटर्न को पोल्ट्री से मासिक ढ़ाई लाख
(सभी तस्वीरें- हलधर)
बेलासर, बीकानेर। ना तो यह किसी उद्योग के मालिक है, ना ही कोई बडे कारोबारी। कारोबार और उद्योग से दूर तक वास्ता नहीं है। फिर भी, घर बैठे मासिक लाखों रूपए कमा रहे है। जी हां, पोल्ट्री-गोटरी और फिशरीज के बलबूते कुछ ऐसी ही कहानी लिख रहे है डेनमार्क रिर्टन वीरेन्द्र लुणू। जो पोल्ट्री से मासिक ढ़ाई लाख रूपए की बचत ले रहे है। जबकि, फिशरीज और गोटरी से भी सालाना लाखों रूपए की बचत प्राप्त कर रहे है। गौरतलब है कि 5 साल पहले वीरेन्द्र ने 10 मुर्गियों के सहारे पोल्ट्री क्षेत्र में कदम रखा था। किसान वीरेन्द्र ने हलधर टाइम्स को बताया कि परिवार के पास 32 बीघा जमीन है। खेतों में अब भी परम्परागत फसलों का उत्पादन हो रहा है। लेकिन, मेरे खेती से जुडऩे के बाद खेती से होने वाली आय का ग्राफ पोल्ट्री, गोटरी और फिशरीज से मिलने वाली आमदनी की तुलना में छोटा नजर आने लगा है। बता दें कि वीरेन्द्र ने पॉलिटेक्निक करने के बाद रोजगार के लिए मुर्गीपालन को चुना। उन्होने बताया कि 10 मुर्गियों से सहारे उद्यम शुरू किया। थोड़ा मुनाफ दिखा तो मुनाफे का निवेश पक्षियो की संख्या बढाने में किया। समय के साथ उद्यम चल निकला और अब वैज्ञानिक तौर-तरीके से मुर्गीपालन कर रहा हॅू। उन्होंने बताया कि वर्तमान में मेरे पास मुर्गियों की संख्या 500 के करीब है। वहीं, मुर्गियों से सालाना ढ़ाई लाख रूपए की बचत मिल जाती है। उन्होने बताया कि परम्परागत फसलों में मूंगफली और गेहूं का उत्पादन लेता हॅॅू। इन फसलों से सालाना 5 लाख रूपए सालाना की आय हो जाती है। गौरतलब है कि राज्य सरकार द्वारा हाल ही में डेनमार्क भेजे गए किसान दल के सदस्य भी रहे है। उन्होने बताया कि डेनमार्क में खेती ऑटोमेशन पर आधारित है। क्योंकि, वहां लेबर नहीं है। जबकि, यहां लेबर है, जो ऑटोमेशन से सस्ता विकल्प है। यदि यहां ऑटोमेशन को लागू कर दिया जाएं तो कृषि मजदूरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जायेगा।

डिग्गी में मछलीपालन
उन्होंने बताया कि मुर्गीपालन में सफलता मिलने के बाद 100 गुना 100 आकार की डिग्गी में मछली पालन का काम शुरू किया। वर्तमान में रोहू, कतला और मृगल तीनों प्रजाति की मछलियों का पालन कर रहा हॅू। इससे भी सालाना डेढ़ से दो लाख रूपए की आमदनी हो जाती है। उन्होने बताया कि मछलीपालन का कार्य आपके पास पानी की सुविधा पर निर्भर करता है।

बकरीपालन से 4 लाख
उन्होंंने बताया कि राष्ट्रीय पशुधन विकास मिशन योजना का लाभ उठाते हुए गोटरी यानी बकरीपालन का काम शुरू किया। वर्तमान में मेरे पास सिरोही नस्ल की 270 बकरियां है। उन्होने बताया कि बकरीपालन में मुनाफा ज्यादा नहीं है। क्योंकि, इस व्यवसाय में किसान के पास निवेश के लिए पैसा होना जरूरी है। छोटे स्तर पर यह व्यवसाय लाभकारी है। उन्होने बताया कि बकरीपालन का सालाना खर्च निकालने के बाद 4 लाख रूपए की बचत मिलती है।
