रसायन छोड़ अपनाई प्राकृतिक खेती, अब सालाना लाखों की कमाई
(सभी तस्वीरें- हलधर)
जालमपुरा, जयपुर। प्राकृतिक खेती के दूसरे नायक है किसान प्रेमचंद कपाया। जो अरावली की वादियों में झारखंड, छत्तीसगढ़ में पैदा होने वाली लघु धान्य फसलों का प्राकृतिक उत्पादन ले रहे है। साथ ही, नर्सरी और जैविक खाद का व्यवसायिक स्तर पर उत्पादन ले रहे है। गौरतलब है कि किसान प्रेमचंद प्रदेश के किसानों को ब्रांड एम्बेसडर के रूपए में प्राकृतिक खेती के गुर तो सिखाएंगा। लेकिन, अब जरूरत कृषि उत्पाद मार्केटिंग के ब्रांड एम्बेसडर बनाने की भी नजर आ रही है। क्योंकि, इस किसान को प्राकृतिक उपज का बेहत्तर मौल नहीं मिल पा रहा है। किसान प्रेमचंद ने हलधर टाइम्स को बताया कि मेरे पास एक हैक्टयर जमीन है। 12वीं पास करने के साथ ही खेती से जुड़ गया। पहले तो रासायनिक खेती करता रहा। लेकिन, कृषि प्रशिक्षणों में भाग लेने से जैविक और प्राकृतिक खेती के बारे में पता चला। फिर, कृषि अधिकारियों के प्रोत्साहन से कुछ अलग करने की ठानी। पहले खेतों को रसायन फ्री बनाने के लिए वर्मी खाद और जैव रसायन का उपयोग करना शुरू किया। फिर, कम लागत वाली फसलों पर फोकस किया। इसके लिए झारखंड से कोदों, सावा और रागी का बीज मंगवाया और उत्पादन शुरू किया। इन फसलों से उत्पादन तो अच्छा मिल रहा है। लेकिन, उचित भाव नहीं मिल पा रहे है।
नर्सरी से सालाना 3 लाख
उन्होंने बताया कि कृषि विज्ञान केन्द्र से प्रशिक्षण लेने के बाद पौन बीघा क्षेत्र में नर्सरी स्थापित की। इस काम को दशक से ज्यादा का समय हो चुका है। नर्सरी में आम, जामुन, आंवला, नींबू, सीताफल, जंगल जलेबी के साथ-साथ पुष्प, औषधीय, सजावटी और सब्जी पौध तैयार करता हॅू। सालाना 8-10 लाख पौधें तैयार हो रहे है। इससे खर्च निकालने के बाद सालाना 3 लाख रूपए की बचत मिल जाती है।
वर्मी खाद की बड़ी यूनिट
उन्होंने बताया कि घर के लिए वर्मी खाद का उत्पादन अब व्यवसायिक रूप ले चुका हैॅ। सालाना 25-30 टन वर्मी खाद का उत्पादन मिल रहा है। इससे तीन लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है। वहीं, पशुधन में मेरे पास 4 गाय और एक भैंस है। दुग्ध उत्पादन से प्रतिदिन 350 रूपए की आमदनी हो जाती है।