जमीन के आधे रकबे से 3 गुना आय, अमरूद-बेर की खेती
(सभी तस्वीरें- हलधर)मुई, सवाईमाधोपुर। दो नौकरी छोडक़र अमरूद उपजाने वाले किसान है हरगोविंद मीना। जो छह साल पहले तक तीस बीघा जमीन से 3 से 4 लाख रूपए की आमदनी लेते है। लेकिन, आय का ये आंकड़ा अब दोगुना से ज्यादा हो चुका है। यह संभव हुआ है अमरूद और बेर की बागवानी से। उनका कहना है कि जमीन के आधे रकबे से ही 10 से 11 लाख रूपए की आय मिल रही है। जबकि, सकल आय का आंकड़ा 16-17 लाख रूपए के करीब है। किसान हरगोविंद ने हलधर टाइम्स को बताया कि वर्ष 1985 में स्नातक करने के साथ ही पंचायत समिति में नौकरी लग गया। लेकिन, कुछ समय नौकरी करके छोड़ दी। इसके बाद वन विभाग में भी चयन हुआ। यहां भी दो महिने नौकरी की और फिर घर आ गया। इसके बाद ग्रामीण राजनीति का शौक चढ़ गया और परम्परागत फसलों का उत्पादन लेता रहा। लेकिन, अब विशुद्ध रूप से किसान बन चुका हॅू। उन्होंने बताया कि 6 साल पहले तक खेती से ज्यादा आय नहीं मिलती थी। लेकिन, अब जमीन के आधे रकबे से ही परम्परागत फसलों की तुलना में दोगुना से ज्यादा आय मिल रही है। यह संभव हुआ है अमरूद और बेर की बागवानी से। उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए मेरे पास ट्यूबवैल है। परम्परागत फसलों में सरसों, चना, मैथी, उड़द, मूंग आदि फसलों का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलों से सालाना ढाई से तीन लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है। गौरतलब है कि आय का आंकड़ा बढाने में इनकी पत्नी मुरता देवी का भी बराबर का सहयोग रहा है।
16 बीघा में अमरूद
उन्होंने बताया कि टिकाऊ आय और पानी की समस्या को देखते हुए 6 साल पहले अमरूद की खेती का रूख किया। 16 बीघा क्षेत्र में अमरूद के 1600 पौधे लगे हुए है। इनसे सालाना 10 से 11 लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है। उन्होंने बताया कि अमरूद के पौधों की उम्र बढऩे के साथ ही आय का आंकड़ा भी बढ़ रहा है। पिछले साल बगीचे से साढे आठ लाख रूपए की आमदनी मिली थी। जबकि, इस साल 11 लाख रूपए की।

बेर से दो लाख
उन्होंने बताया कि अमरूद की खेती में सफल रहने के बाद बेर का बगीचा स्थापित किया। खेत में बेर के 500 पौधें लगे हुए है। यह बगीचा भी चार साल का हो चुका है। इससे बेर की फसल भी आय देने लगी है। उन्होंने बताया कि बेर के बगीचे से सालाना दो लाख रूपए की आमदनी मिल रही है।
पशुपालन से बेहत्तर आय
उन्होंने बताया कि पशुधन में मेरे पास 6 भैंस है। प्रतिदिन 20 किलोग्राम दुग्ध का उत्पादन हो रहा है। दुग्ध का विपणन डेयरी को नहीं करता हूॅॅ। घरेल आवश्यकता पूर्ति के बाद शेष रहने वाले दुग्ध से घी तैयार करता हॅू। इससे पशुधन के साथ-साथ परिवार का दैनिक खर्च निकल जाता है। वहीं, घी बिक्री से लाभ मिल जाता है। उन्होंने बताया कि पशु अपशिष्ट से वर्मी खाद का उत्पादन कर रहा हॅू। तैयार वर्मी कम्पोस्ट बगीचे में काम आ जाता है।
स्टोरी इनपुट: धरतीराज मीना, कृषि विभाग, सवाईमाधोपुर