खेती ही बिजनेस, एमबीए पास ने सूखे में बरसायी लक्ष्मी
(सभी तस्वीरें- हलधर)रेतीले खेतों में आय को नया ग्राफ बनाने का काम किया है एमबीए पास नील चौधरी ने। जिन्होने ना केवल सूखे में लक्ष्मी बरसायी। बल्कि, 5 साल के भीतर ही संरक्षित खेती के ग्राफ को 4 हजार से बढ़ाकर 44 हजार वर्ग मीटर तक ले गए। किसान नील चौधरी ने बताया कि खीरा और शिमला मिर्च की फसल से सालाना 60-70 लाख रूपए की औसत बचत मिल रही है। गौरतलब है कि किसान नील चौधरी 70 बीघा जमीन लीज पर लेकर संरक्षित खेती का दायरा बढ़ाने में जुटे है। मोबाइल 97845-90542
राणावास,पाली। युवा हौंसले और आधुनिक कृषि तकनीक की यह कहानी है एमबीए पास नील चौधरी की। जिन्होंने असंभव को संभव बनाया और एक-एक करके 5 साल के भीतर ही 11 एकड़ क्षेत्र को संरक्षित के दायरे में ला दिया। परिणाम रहा है कि अब सूखे में भी लक्ष्मी बरस रही है। किसान नील संरक्षित खेती से सालाना 60-70 लाख रूपए की शुद्ध आमदनी ले रहा है। किसान नील चौधरी ने हलधर टाइम्स को बताया कि सोनीपत से एमबीए करके गांव लौटा। कुछ नया करने की चाहत मुझे केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान खींचकर ले गई। संस्थान परिसर में लगे पॉली हाउस को देखकर खेती में ही कुछ कर गुजरने का विचार मन में आया और आज परिणाम सबके सामने है। उन्होने बताया कि वर्ष 2020 में काजरी से संरक्षित खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया और इसी साल 4 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में पॉली हाउस का निर्माण करवाया। इसमें खीरे की फसल ली। मुनाफा अच्छा मिला तो खेती को बिजनेस का रूप देना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि परिवार के पास खेती योग्य जमीन है। लेकिन, पानी नहीं है। इस कारण वर्तमान में लीज आधारित जमीन पर ही अपने सपनों को आसमान देने में जुटा हॅू। उन्होंने बताया कि पैतृक जमीन पर बरसाती फसलों का उत्पादन होता है। जो भी उपज और लाभ मिलता है, वह परिजनों तक सीमित रहता है।
ऐसे बरसी लक्ष्मी
उन्होंने बताया कि पॉली हाउस में मिली सफलता को देखते हुए एक कदम और आगे बढाया। जो भी मुनाफा मिला, उसका निवेश शैडनेट हाउस तैयार करने में करना शुरू किया। परिणाम रहा है कि 44 हजार वर्ग मीटर जमीन संरक्षित खेती के दायरे में आ चुकी है। वर्तमान में 10 शैडनेट हाउस और एक पॉली हाउस मेरे पास है। इनमें साल में दो फसल खीरा और रंगीन शिमला मिर्च का उत्पादन ले रहा हॅू। उन्होने बताया कि इन फसलों से सालाना 60-70 लाख रूपए की शुद्ध बचत मिल रही है।
कृषि मजदूरों को रोजगार
उन्होने बताया कि मेरे प्रयास से स्थानीय कृषि मजदूरों को भी रोजगार मिला है। तुड़ाई सीजन के दौरान करीब 35 महिला श्रमिक और 4-5 सुपरवाईजर खेत में काम देखते है। इससे उन्हें भी घर बैठे बेहत्तर दिहाड़ी उपलब्ध होने लगी है।
यहां बेचते है उपज
उन्होने बताया कि खेत में उत्पादित फसल का विपणन पाली, जोधपुर और जयपुर मंड़ी मेंं कर रहा हूॅ। उन्होने बताया कि फसल को मंड़ी में भेजने से पूर्व मंड़ी भाव देखता हॅू। जिस मंड़ी में ज्यादा भाव हो, वहां पर उपज की बिक्री करता हॅू।
स्टोरी इनपुट: डॉ प्रदीप कुमार, डॉ. धीरज सिंह, डॉ. एसपीएस तंवर, काजरी, जोधपुर