पानी की कमी से बागवानी छूटीं, अब इस काम से मिल रही लाखों की आमदनी
(सभी तस्वीरें- हलधर)
गोविंद सिंह जी का खेड़ा, भीलवाड़ा। मर्ज यह नहीं कि जमीन और हौंसला कम है। मर्ज यह है कि पानी कम है। यही कारण है कि चाहकर भी कई किसान कृषि नवाचार से ऊंची उड़ान नहीं भर पा रहे है। ऐसे ही कुछ अनुभवों से दो चार है किसान नारायणलाल गाडऱी। जिन्होंने पहले संतरा की खेती में भाग्य आजमाया। लेकिन, पानी की कमी बगीचे को निगल गई। इसके बाद पशुपालन को नगद आमदनी का आधार बनाया। परिणाम रहा आमदनी में भी बढौत्तरी दर्ज हुई। वहीं, नई बागवानी फसल को भी खेतों में विस्तार मिला। गौरतलब है किसान नारायण को खेती और पशुपालन से सालाना 4 लाख रूपए की आमदनी मिल रही है। किसान नारायण ने हलधर टाइम्स को बताया कि मेरे पास 20 बीघा जमीन है। 8वीं पास करने के बाद से खेती कर रहा हॅू। उन्होंने बताया कि पहले तो परम्परागत फसलो की खेती तक सीमित रहा। बाद में आमदनी बढाने के लिए संतरे का बगीचा स्थापित किया। उन्होंने बताया कि बगीचे से आमदनी मिलना शुरू हुई तो सूखे की मार सहनी पड़ी। लेकिन, कुछ सालों तक जैसे-तैसे सिंचाई के पानी का जुगाड़ करता रहा। लेकिन, एक दिन वो भी आया, जब पानी की मार के चलते अपने ही हाथो बगीचे को नष्ट करने को मजबूर हुआ। उन्होंने बताया कि टिकाऊ आय का जरिया खत्म होने के साथ पशुपालन को व्यवसाय का रूप दिया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में परिवार की जो आर्थिक स्तर है, वह पशुपालन का भी परिणाम है। उन्होंने बताया कि इस व्यवसाय के दौरान आई परेशानियों ने मुझे कृषि विज्ञान केन्द्र से जोडऩे का काम किया। यही से परम्परागत फसलो के बेहत्तर उत्पादन के गुर सीखने को मिले। इससे भी आय बढाने में मदद मिली। उन्होंने बताया कि सिंचाई के लिए मेरे पास कुआं है। परम्परागत फसल में गेहूं, चना, मसूर, मक्का और मूंग का उत्पादन लेता हॅॅू। इन फसलों से खर्च निकालने के बाद दो लाख रूपए की आमदनी मिल जाती है।
ऐसे बढ़ी आय
उन्होंने बताया कि संतरे के बगीचे में थोड़ा बहुत नुकसान खाने के बाद पशुपालन को व्यवसाय का रूप दिया। समय के साथ पशुधन की संख्या दो दर्जन के पार कर गई। लेकिन, मजदूरो की समस्या के चलते अब पशुधन की संख्या घटा दी है। वर्तमान में मेरे पास 4 गाय और 4 भैंस है। प्रतिदिन 18-20 लीटर दुग्ध का उत्पादन मिल रहा है। उन्होंने बताया कि इसमें से 15 लीटर दुग्ध उपभोक्ताओं को 40-45 रूपए प्रति लीटर की दर से बिक्री कर देता हॅॅू। इससे मासिक 12-15 हजार रूपए की बचत मिल जाती है। वहीं, गोबर खेतों में काम आ जाता है। इसके अलावा आधा दर्जन बकरियां मेरे पास है।
आंवला-नींबू का बगीचा
उन्होने बताया कि कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रोत्साहन से पाकर 2 बीघा क्षेत्र में नवीन बगीचा स्थापित किया है। बगीचे में आंवला और नींबू के पौधें लगाए है। जो तीन साल के हो चुके है। आगामी मौसम से बगीचे से आय मिलना शुरू हो जायेगी।
स्टोरी इनपुट: डॉ. सीएम यादव , के वीके, भीलवाड़ा