पपीते की खेती से होगी शानदार कमाई, एक पौधे से मिलेंगे 900 रुपये 

नई दिल्ली 12-Oct-2026 01:02 PM

पपीते की खेती से होगी शानदार कमाई, एक पौधे से मिलेंगे 900 रुपये 

(सभी तस्वीरें- हलधर)

हलधर टाइम्स/ अरनिया, झालावाड़। कहते है उम्मीद पर दुनिया कायम है... कुछ ऐसी ही उम्मीद मन में रखकर पपीता की खेती से जुडऩे वाले किसान है सियाराम मीणा। जिन्होंने उद्यानिकी अधिकारियों के मागदर्शन में उम्मीदों की फसल लगाई है। खेत में मेहनत का फल बाजार छूने को तैयार है। पौधों पर लगे फलों को देखकर बेहत्तर आमदनी मिलने की संभावना भी धरातल लेती नजर आ रही है। विभागी अधिकारियो की माने तो पपीते के एक पौधें से औसतन 700ञ900 रूपए की आमदनी मिल जाती है। किसान सियाराम ने हलधर टाइम्स को बताया कि कभी स्कूल को मुंह नहीं देखा। पहले परिवार संयुक्त रहा। इस कारण खेती की जिम्मेदारी से थोड़ा आजाद रहा। रोजी-रोटी के लिए 5-6 साल ट्रेक्टर चलाया। जब बंटवारा हुआ तो 10 बीघा जमीन मेरे हिस्से आई। इस पर परम्परागत फसलो का उत्पादन लेता रहा। लेकिन, इन फसलो से खर्च निकालने के बाद कम बचत ने चिंता बढ़ा दी। क्योंकि, परिवार का खर्च चलाने में भी दिक्कत सामने आने लगी थी। कुछ नया करने की सोच के साथ कृषि विभाग के कार्र्यक्रमों में भाग लेना शुरू किया। अधिकारियों से सम्पर्क बढ़ा और खेतों में पपीता की फसल लहलहाने लगी। उन्होने बताया कि उद्यान विभाग के अधिकारियों के मागदर्शन में पहली बार पपती की खेती शुरू की है। उन्होने बताया कि सिंचाई के लिए मेरे पास कुआं है और परम्परागत फसलों में लहसुन, गेहूं, धनिया, सोयाबीन, मक्का का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलों से सालाना 50-60 हजार रूपए की आमदनी मिल जाती है।

4 बीघा में बगीचा

उन्होंने बताया कि 4 बीघा क्षेत्र में पपीता के 1600 पौधें लगाए थे। लेकिन, बारिश के दौरान बांध का पानी खेत में भरने से करीब 400 पौधों का नुकसान उठाना पड़ा है। वर्तमान में 1200 पौधों पर फल लगे हुए है। इससे बेहत्तर आय की उम्मीद बंधी है। अक लेरा के कृषि पर्यवेक्षक उद्यान सुनील बैरवा ने बताया कि पपीता की खेती किसानों के लिए लाभकारी है। इससे कम समय में बेहत्तर आमदनी प्राप्त की जा सकती है। एक पौधें से औसतन 700-900 रूपए तक आमदनी मिल जाती है।

पशुपालन से भी आय

उन्होंने बताया कि समय के साथ कृषि जानकारी बढने से अब जैविक की ओर जा रहा हॅू। इसके लिए 2 गाय, दो भैंस और 2 बकरियां मेरे पास है। जिससे परिवार का दुग्ध-घी खाने को मिल जाता है। वहीं, फसल के लिए जैविक आदान की पूर्ति हो जाती है।

स्टोरी इनपुट: सुनील बैरवा, कृषि पर्यवेक्षक-उद्यान, अकलेरा 


ट्रेंडिंग ख़बरें