डेयरी फार्मिंग ने बदली रिटायर्ड शिक्षक की जिंदगी, अब लाखों की कमाई
(सभी तस्वीरें- हलधर)
25 एमएल, श्रीगंगानगर। तीन साल ठेकेदारी की। फिर अध्यापक बना और रिटायरमेंट के बाद डेयरी को आजीविका का जरिया बना लिया। जी हां, कुछ ऐसी ही कहानी है डेयरी फार्मिंग से जुड़े वीरसेन यादव की। जिन्होंने सेवानिवृत्त होने के बाद व्यावसायिक रूप से पशुपालन शुरू किया और दो साल के भीतर ही मासिक आय का आंकड़ा लाख रुपए से ऊपर पहुंचा दिया। पशुपालक वीरसेन ने हलधर टाइम्स को बताया कि हायर सैकेण्डरी करने के बाद सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया। इसके बाद रोजी-रोटी के लिए तीन साल ठेकेदारी का काम किया। बाद में मेरिट के आधार पर प्रयोगशाला सहायक के रूप में मेरा चयन हो गया। फिर, विभागीय प्रशिक्षण के बाद अध्यापक बन गया। उन्होंने बताया कि यूं तो पशुपालन से जुड़ाव शुरू से रहा है। लेकिन, पहले घरेलू आवश्यकता पूर्ति के लिए तीन-चार पशु रखते थे। लेकिन, रिटायर होने के बाद मैंने पशुपालन को व्यवसाय बना लिया। इसी का परिणाम है कि प्रतिदिन दो क्विंटल के करीब दुग्ध का उत्पादन हो रहा है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में मेरे पास छोटी बड़ी करके 30 के करीब गाय हैं। इससे लाख रुपए से ज्यादा की मासिक बचत हो रही है। डेयरी फार्मिंग के काम से मेरे साथ-साथ दो व्यक्तियों को भी रोजगार मिला है। उन्होंने बताया कि पशुओं के लिए 61 गुना 46 फीट आकार का पक्का पशु शैड बनाया हुआ है। इसके अलावा 25 फीट जगह खुले विचरण के लिए छोड़ी हुई है। पशुओं को हरा चारा उपलब्ध कराने के लिए 12 बीघा जमीन में चारा फसलों का उत्पादन ले रहा हूं।
7 बीघा में किन्नू का बाग
उन्होंने बताया कि डेयरी के साथ-साथ खेतों की मेहनत घटाने और टिकाऊ आय के लिए 4 बीघा जमीन में किन्नू का बगीचा स्थापित किया है। वहीं, आधा बीघा जमीन में मिश्रित बगीचा लगाया हुआ है। उन्होंने बताया तीन-चार साल के बाद किन्नू से भी आय मिलना शुरू हो जायेगी।
इन फसलों का उत्पादन
उन्होंने बताया कि परम्परागत फसलों में मूंग, कपास, गेहूं, चना, मेथी और सरसों का उत्पादन लेता हूं। इन फसलों से पशुधन के लिए चारा भी मिल जाता है। वहीं, थोड़ी बहुत आमदनी मिल जाती है। गौरतलब है कि किसान वीरसेन के पास 40 बीघा जमीन है। सिंचाई के लिए ट्यूबवैल हैं।
स्टोरी इनपुट: संदीप कुमार सेन, वरि. कृषि पर्यवेक्षक, 9 एमएल, श्रीगंगानगर