शेखावाटी की खेती को नई रफ्तार देगी सरसों की नई किस्म

नई दिल्ली 20-Jul-2026 01:00 PM

शेखावाटी की खेती को नई रफ्तार देगी सरसों की नई किस्म

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा
जयपुर। प्रदेश के शेखावाटी क्षेत्र में सरसों उत्पादन को धार देने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने सरसों की नई किस्म तैयार की है। यह किस्म लवणीय-क्षारीय पानी के साथ-साथ ज्यादा तापमान में भी बेहत्तर पैदावार देगी। गौरतलब है कि इस किस्म का विकास कृषि अनुसंधान केन्द्र, फतेहपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने किया है। वैज्ञानिकों कहना है कि इस किस्म के विकास से शेखावाटी क्षेत्र के किसानों को हर परिस्थति में ज्यादा पैदावार देने वाली किस्म का बीज उपलब्ध होगा। वहीं, देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की राह भी आसान होगी। वैज्ञानिकों ने नव विकसित किस्म को सीए-68 नाम दिया है। गौरतलब है कि प्रदेश के सरसों की खेती 30-35 लाख हैक्टयर क्षेत्र में होती है। लेकिन, शेखावाटी क्षेत्र के लिए अब तक ऐसी किस्म का विकास नहीं हो पाया था जो माइनस तापमान के साथ-साथ उच्च तापक्रम, लवणीय और क्षारीय पानी में किसानोंं को बेहत्तर पैदावार प्रदान कर सके। इस स्थिति को देखते हुए केन्द्र के वैज्ञानिकों ने सरसों किस्म विकास के प्रयास शुरू किए और आखिरकार सफलता हाथ लग ही गई। बता दें कि इस किस्म में विकास में केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल (हरियाणा) के वैज्ञानिकों का भी तकनीकी सहयोग रहा है। कृषि अनुसंधान केंद्र के डॉ. चम्पालाल खटीक, डॉ. एमए खान और केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉण् जोगेंद्र सिंह ने इस किस्म को तैयार किया है। 

हीटस्ट्रेस-पाले से महफूज

गौरतलब है कि प्रदेश के साथ-साथ देश में लाखों हैक्टयर भूमि लवणीयता और क्षारीयता की समस्या से ग्रसित है। इस कारण किसानों को सामान्य सरसों किस्म से आशातीत उत्पादन नहीं मिल पाता है। लेकिन, इस किस्म के विकास के बाद प्रदेश के साथ-साथ देश के किसानों को अब पीछे देखने की जरूरत नहीं रहेगी। किस्म के प्रजनक वैज्ञानिक डॉ. चम्पालाल खटीक ने बताया कि इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहु-अजैविक तनाव  सहनशीलता है। यह अधिक लवणता, उच्च तापमान (हीट स्ट्रेस) और पाले जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर वृद्धि और उत्पादन देने में सक्षम है। 

क्या होगा फायदा

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह किस्म उन क्षेत्रों में विशेष रूप से लाभदायक होगी जहाँ सिंचाई के लिए उपलब्ध जल में लवणता अधिक है अथवा मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित है। ऐसी परिस्थितियों में भी यह किस्म स्थिर उत्पादन देने की क्षमता रखती है। जिससे किसानों की आय में वृद्धि और तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी की संभावना है।

20-22 क्विंटल तक पैदावार

उन्होंने बताया कि सीएस-68 मध्यम अवधि की किस्म है, जो 128 से 134 दिनों में तैयार हो जाती है। इसके पौधे की औसत ऊँचाई लगभग 190 सेंटीमीटर है और इसकी संभावित उपज 20 से 22 क्विंटल प्रति हैक्टयर तक दर्ज की गई है। उचित कृषि प्रबंधन से किसान बेहतर गुणवत्ता के साथ अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीएस-68 जैसी उन्नत किस्में देश में खाद्य और पोषण सुरक्षाए खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। 

सीएस-68 मुख्य विशेषताएँ

  • समय पर बुवाई के लिए उपयुक्त। 
  • लवणीय-क्षारीय मिट्टी में बेहतर प्रदर्शन। 
  • खारे-क्षारीय सिंचाई जल को सहन करने की क्षमता। 
  • लवणता, गर्मी और पाले के प्रति सहनशील। 
  • फसल अवधि: 128-134 दिन। 
  • पौधे की औसत ऊँचाई: 190 सेमी। 
  • संभावित उपज: 20-22 क्विंटल प्रति हैक्टयर। 
  • जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन क्षमता। 

यह किस्म विशेष रूप से लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी तथा खारे सिंचाई जल वाले क्षेत्रों के साथ-साथ शेखावाटी क्षेत्र के किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इससे सरसों की उत्पादकता बढ़ेगी और किसानों को आर्थिक लाभ मिलेगा।
प्रो. हरफू ल सिंह, जेडीआर, एआएस, फतेहपुर

प्रतिकूल कृषि परिस्थितियों के लिए विकसित यह किस्म किसानों की आय बढ़ाने, तिलहन उत्पादन में वृद्धि और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगी। 
डॉ. पीएस चौहान, कुलगुरू, एसकेएन कृषि विवि. जोबनेर


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