हाड़ौती के किसानों की चांदी, COENF से 4 फसलें बदल देगी तकदीर
(सभी तस्वीरें- हलधर)जयपुर। सोयाबीन सहित चार फसलें अब प्राकृतिक होने जा रही है। यह काम इतना आसान नहीं है। क्योंकि, इस फसल में गर्डल बीटल, सेमीलूपर, तंबाकू इल्ली, सफेद मक्खी जैसे कई हानिकारक कीट और रोगों को प्रकोप होता है। ऐसे मेें जैव कीटनाशकों से इन कीटो का नियंत्रण कृषि वैज्ञानिकों के लिए किसी चुनौति से कम नहीं है। बता दें कि कृषि विश्वविद्यालय कोटा ने सोयाबीन को प्राकृतिक बनाने का बीड़ा उठाया है। इसके अलावा गेहूं, चना और उड़द का उत्पादन भी प्राकृतिक तौर-तरीके से लिया जायेगा। यह शोध कार्य तीन वर्षीय परियोजना के तहत किया जायेगा। दरअसल, आईसीएआर, नई दिल्ली ने विश्वविद्यालय के कृषि अनुसंधान केन्द्र, उम्मेदगंज पर प्राकृतिक खेती उत्कृष्टता केन्द्र स्थापना को मंजूरी दी है। ताकि, हाड़ौती क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के साथ ही प्रमुख फसलों के लिए पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज तैयार की जा सके।
जैव कीटनाशक का जांचेंगे प्रभाव
इस केन्द्र पर वैज्ञानिक सोयाबीन, उड़द, गेहंू और चना फसल में लगने वाले कीट और रोग नियंत्रण के लिए प्रकृति अनुकूल समाधान खोजेंगे। ताकि, स्वस्थ मृदा के साथ-साथ बेहत्त पोषण का लक्ष्य भी हासिल हो सके। गौरतलब है कि हाड़ौती संभाग में सोयाबीन प्रमुख खरीफ फसल है। लेकिन, उत्पादकता मेंं आए ठहराव से किसान अब फसल उगाने से तौबा करने लगे है। क्योंकि, इससे प्रति एकड़ तीन से चार क्विंटल तक उत्पादन मिल रहा है। वहीं, बाजार भाव कम रहने की स्थिति में सोयाबीन का उत्पादन किसानों के लिए घाटे का सौदा बन जाता है। बता दें कि इस संभाग में 6-7 लाख हैक्टयर क्षेत्र में सोयाबीन की बुवाई होती है। क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान डॉ. बीएस मीणा ने बताया कि इस उत्कृष्टता केन्द्र से हाड़ौती क्षेत्र में रसायन मुक्त गौ आधारित जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी।
शोध छात्रों को मिलेगा लाभ
निदेशक अनुसंधान डॉ.एमसी जैन ने बताया कि इस परियोजना में कृषि महाविद्यालय, कोटा के एमएससी और पीएच.डी. छात्रों को भी शोध कार्य करवाया जाएगा। परियोजना के सह प्रभारी डॉ. श्रवण कुमार यादव, डॉ. बीके पाटीदार, डॉ. सीबी मीणा, डॉ. एसएन मीणा, डॉ. एलके मीणा, डॉ. आरके यादव, डॉ. सोनल शर्मा और डॉ. ज्योति कंवर रहेंगे।
परियोजना के तहत कीट-रोग और खरपतवार नियंत्रण के लिए विभिन्न तरल खादो की पहचान की जायेगी। साथ ही, किसानों को प्रशिक्षित किया जाना है। आईसीएआर की यह परियोजना तीन साल तक चलेगी।
डॉ. विमला डूंकवाल, कुलगुरू, एयू कोट