खेजड़ी आधारित खेती के चार मॉडल तैयार

नई दिल्ली 13-Nov-2025 12:02 PM

खेजड़ी आधारित खेती के चार मॉडल तैयार

(सभी तस्वीरें- हलधर)

पीयूष शर्मा

जयपुर। थार में बागवानी की संभावनाओं को देखते हुए केन्द्रीय शुष्क बागवानी अनुसंधान संस्थान, बीकानेर के वैज्ञानिकों ने खेजड़ी आधारित यानी पर्यावरणीय खेती के चार मॉडल तैयार किए है। वैज्ञानिको का कहना है कि शुष्क और अद्र्धशुष्क क्षेत्र के किसान इन मॉडल को अपनाकर खेती से अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सकेंगे। इन मॉडल की विशेषता यह है कि   मुख्य फसल के साथ-साथ किसान चारा, लूम, बेर, आंवला, अमरूद, सीताफल, मौसमी, नींबू का भी उत्पादन एक ही खेत में कर सकेंगे। गौरतलब है कि संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित 12 मॉडल पर करीब 15 साल अध्ययन किया है। इसके बाद चार मॉडल को किसानों की आय बढौत्तरी में कारगर पाया है। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दिलीप कुमार समादिया ने बताया कि पश्विमी राजस्थान के किसानों की आय बढौत्तरी के लिए संस्थान शुष्क और अद्र्धशुष्क क्षेत्र में पैदा होने वाली फसलो के साथ-साथ उपयुक्त बागवानी फसलों पर अनुसंधान कार्य कर रहा है। इसी का परिणाम है कि थार के किसान बागवानी फसल उत्पादन में रूचि दिखाने लगे है। उन्होंने बताया कि खेजड़ी आधारित कृषि मॉडल से किसान को नहीं, पशुधन को भी फायदा होगा। क्योंकि, थार में सुपाच्य चारा फसलो की कमी किसी से छिपी नहीं है। उन्होंने बताया कि इन मॉडल को अपनाकर किसान एक ही खेत में कई शुष्क फसलों का उत्पादन लेकर अपनी आय को दोगुना कर सकता है। उन्होने बताया कि संस्थान के द्वारा 12 मॉडल विकसित किए गए है। लेकिन, इनमें से 4 मॉडल सबसे कारगर पाए गए है। उन्होने बताया कि पर्यावरणीय खेती के इन मॉडल से किसान  को लाख रूपए की अतिरिक्त आय मिलना तय है। 

एमएमआर-3

उन्होने बताया कि केएमआर-3 मॉडल में 8 गुना 8 मीटर की दूरी पर खेजड़ी के पौधें लगाएं जाते है। एक हैक्टयर क्षेत्र के लिए करीब 156 पौधों की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि इस मॉडल के तहत किसान ग्वार, मोठ, चंवला, सरसों, चना और शुष्क सब्जी फसलो का उत्पादन ले सकता है। 

केएम-7

केएम-7 मॉडल खेजड़ी की सघन बागवानी के लिए तैयार किया गया है। इस मॉडल में 4 गुना 4 मीटर की दूरी पर खेजड़ी के पौधें लगाएं जाते है। साथ ही, 16 मीटर की पट्टिकाएं छोड़ी जाती है। इससे किसान सरसों, चना, मोठ फसल का उत्पादन ले सकता है। साथ ही, सेवण, धामण जैसी चारा फसलो के साथ केर, बेर, फोग का बगीचा भी स्थापित कर सकता है। 

केएम-9

इस मॉडल में 4 गुना 4 मीटर की दूरी पर खेजड़ी के पौधें लगााने के साथ-साथ 24 गुना 24 मीटर की पट्टिकाएं कृषि के लिए विकसित की जाती है। इसमें बूंद-बूंद सिंचाई का उपयोग करते हुए किसान सरसों, चना, रायड़ा, ग्वार, मोठ, बाजरा, मतीरा, काजरी, तारामीरा के साथ-साथ शुष्क बागवानी फसलों का उत्पादन ले सकते है। 

केएम-11

उन्होंने बताया कि यह मॉडल बडे किसानों के लिए विकसित किया गया। इस मॉडल को 50 बीघा जोत से बड़े किसान अपना सकते है। उन्होने बताया कि इस मॉडल में 4 गुना 4 मीटर की दूरी पर खेजड़ी के पौधें लगाएं जाते है। साथ ही 44 मीटर दूरी की पट्किाएं विकसित की जाती है। इन पट्टिकाओं में किसान बेर, आंवला, मौसमी, कि न्नू, नींबू की खेती कर सकता है। 

खाद-पानी की जरूरत कम

उन्होने बताया कि इन मॉडल में किसान को खाद-पानी की चिंता करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, यह पूरी तरह से पर्यावरण अनुकूल है। उन्होने बताया कि 4 साल बाद खेजड़ी से इतना अपशिष्ट मिल जाता है कि किसान को खाद डालने की जरूरत ही नहीं रहती। वहीं, फसल भी एक से दो पानी में तैयार हो जाती है। 

ज्यादा पानी घातक

उन्होने बताया कि खेजड़ी में ज्यादा सिंचाई पौधें पर विपरीत प्रभाव डालती है। ज्यादा पानी से पौधें में गांठे पड़ जाती है। उन्होंने बताया कि खेजड़ी आधारित बागवानी में किसान चारे के लिए नवम्बर में छंगाई करे। वहीं, सांगरी और चारे के लिए जून माह में छंगाई करें। उन्होने बताया कि खेजड़ी के एक पेड़ पर दो हजार आंख निकलती है। ऐसे में किसान पहले देसी खेजड़ी के पौधें खेत पर लगाएं। बाद में पौधों पर बंडिग करके बगीचा विकसित करें। उन्होने बताया कि संस्थान किसानों को नि:शुल्क मदर प्लांट उपलब्ध करवा रहा है। 


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