लक्ष्य वर्ष 2035 तक 6500 ग्राम पंचायतों में कृषि मंडियां
(सभी तस्वीरें- हलधर)पीयूष शर्मा
जयपुर। राज्य बजट 2026-27 में प्रदेश के कई ब्लॉक के लिए कृषि उपज मंडियो की घोषणा सरकार कर सकती है। क्योंकि, कृषि उपज विपणन सुविधाओं का विकास सरकार के विजन 2047 यानी विकसित राजस्थान में शामिल है। गौरतलब है कि आजादी के इतने वर्षो बाद भी कई जिलों में जिंस विपणन की ठोस सुविधा उपलब्ध नहीं है। इस कारण किसानों को उपज का उचित दाम नहीं मिल पा रहे है। विपणन सुविधा के अभाव में किसानों को अपनी उपज बिचौलियों को बेचनी पड़ती है। इस कारण किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। गौरतलब है कि प्रदेश के साथ-साथ देश में फल-सब्जी और खाद्यान्न का उत्पादन साल दर साल बढ़ रहा है। लेकिन, किसान आय का आंकड़ा अब भी संतोषजनक नहीं है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसान आय के लिए भंड़ारण के साथ-साथ जिंस विपणन सुविधा और फसल मूल्य संवद्र्धन पर ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन, अब तक सभी सरकारों का फोकस केवल फसल उत्पादन बढौत्तरी तक सीमित रहा है। यदि उत्पादन बढौत्तरी के साथ-साथ जिंस विपणन सुविधाओं पर भी जोर दिया जाता तो किसानों की आर्थिक खुशहाली के लिए फिर से नए सिरे से सोचने की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों और बढ़ती उत्पादन लागत के बीच भारत के कृषि क्षेत्र ने 2025 में बेहतर प्रदर्शन किया है। लेकिन, बढ़े हुए उत्पादन को खपाने में किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। क्योंकि, प्रदेश में कई ऐसे जिले है, जहां जिंस विपणन की सुविधा नाममात्र की है। इस कारण राज्य सरकार को मिलने वाला राजस्व पड़ौसी राज्यों की कृषि मंडिय़ों के खाते में जा रहा है। साथ ही, जिंस विपणन के लिए बाहर जाने किसानों की लागत भी बढ़ रही है। किसानों का कहना है कि सरकार हर साल बजट में नई कृषि उपज और गौण मंडी स्थापना की घोषणा तो करती है। लेकिन, घोषणा के बाद बजट के अभाव में मंडियों का विकास नहीं हो पाता है। इस कारण किसानों की समस्या ज्यो की त्यो बनी रहती है। वहीं, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर होने वाली जिंस खरीद का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है। क्योंकि, इसमें 25 फीसदी का बैरियर किसानों को पीछे की ओर धकेल रहा है।
बढ़े विपणन सुविधा तो बने बात
देश में चावल, गेहूं, मक्का और मोटे अनाजों का उत्पादन 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। सामान्य से बेहतर मानसून, आधुनिक तकनीक और सरकार के प्रोत्साहन के चलते भारत का कृषि क्षेत्र ये लक्ष्य हासिल कर सका है। बंपर पैदावार और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जिंस खरीद का गणित अब भी पहले के जैसे ही गड़बड़ाया हुआ है। क्योंकि, सरकार हर साल रबी-खरीफ फसलों का एमएसपी तो बढ़ा रही है। लेकिन, एक किसान से अधिकतम 40 क्विं टल उपज की खरीद करती है। ऐसे में शेष उपज बाजार के हवाले होती है। फसल के बंपर उत्पादन की स्थिति में बाजार किसान के साथ नहीं रहता। इस कारण किसानों को हर साल बेहत्तर उत्पादन के बावजूद जिंस विपणन के दौरान आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

यह है प्रदेश की स्थिति
प्रदेश में किसानों के लिए विकसित जिंस विपणन सुविधा की बात करें तो 41 जिलों में 173 कृषि उपज मंडियां है। वहीं, 335 गौण मंड़ी क्रियाशील है। किसानों का कहना है कि कृषि उपज मंडियों में जिंस विपणन की थोड़ी बहुत सुविधा है। लेकिन, गौण कृषि उपज मंडियो के हालात खराब है। सरकार द्वारा घोषित कई गौण मंडिय़ों का समुचित विकास अब भी नहीं हो पाया है। जहां थोड़ा बहुत विकास हुआ है, वहां जिंस विपणन की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं होने से किसान इन मंडियों में जाना पसंद नहीं करते है।
2030 तक सभी ब्लॉक में मंड़ी
सरकार ने विजन विकसित राजस्थान 2047 पर नजर डाले तो वर्ष 2030 तक सभी ब्लॉक में कृषि उपज मंड़ी स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। जबकि, वर्ष 2035 तक साढे 6 हजार ग्राम पंचायत में कृषि उपज मंड़ी खोलने की योजना सरकार ने बनाई है। ऐसे में कहा जा सकता है कि यदि सरकार के इस ब्लू प्रिंट ने धरातल लिया तो किसानों की आर्थिक खुशहाली का ताना-बाना मजबूत होने की उम्मीद है।
3 जिले एक-एक मंड़ी के भरोसे
प्रदेश के तीन जिले ऐेसे है, जहां के किसान अब भी जिंस विपणन सुविधाओं में पिछड़ापन झेल रहे है। ये जिले है प्रतापगढ़, डूंगरपुर और बांसवाड़ा। इन जिलों में जिंस विपणन की सुविधा केवल जिला मुख्यालय पर ही उपलब्ध है। जबकि, इन तीनों ही जिलों में जनजातिय किसानों का बाहुल्य है। किसानों का कहना है कि जिंस विपणन की सुविधा जिला मुख्यालय पर होने से लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे कृषि लागत ज्यादा आती है। सरकार को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।
मंंड़ी टैक्स की मार
राजस्थान सरकार भले ही किसानों की आय बढ़ाने और मंडी व्यवस्था को मजबूत करने के दावे करे लेकिन सीमावर्ती क्षेत्र की जमीनी हकीकत इन दावों के उलट है। अधिक मंडी टैक्स, ज्यादा कटौती और दूरी की मार ने किसानों और व्यापारियों को मजबूर कर दिया है कि वे अपनी उपज राजस्थान में नहीं, बल्कि गुजरात की मंडियों में बेचें। नतीजा यह है कि राजस्थान का गेहूं,मक्का, कपास और मूंगफली गुजरात की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। किसानों के अनुसार राजस्थान में मंडी टैक्स 1.65 रुपए प्रति क्विंटल, गुजरात में मंडी टैक्स मात्र 50 पैसे प्रति क्विंटल है। यही बड़ा अंतर किसानों की जेब तय करता है। कम टैक्स और कम कटौती के कारण गुजरात में उपज बेचने पर सीधा फायदा होता है।