टैग उत्पाद किसानों पर बढ़ा रहे आर्थिक भार, विधानसभा में भी उठा मामला

नई दिल्ली 09-Mar-2026 06:00 PM

टैग उत्पाद किसानों पर बढ़ा रहे आर्थिक भार, विधानसभा में भी उठा मामला

(सभी तस्वीरें- हलधर)

जयपुर। नैनो यूरिया और डीएपी का जिन्न अब बोलत से निकलकर विधानसभा तक जा पहुंचा है। हालांकि, किसानों को टैग उत्पादों से छुटकारा मिलेगा या नहीं, यह बात तो सरकार की मंशा पर निर्भर है। लेकिन, किसानों को राहत देने के लिए उत्तरप्रदेश की तर्ज पर कानून बनाने की मांग उठ चुकी है। गौरतलब है कि इफको सहित दूसरी उर्वरक निर्माता कंपनियां किसानो को यूरिया, डीएपी बैग के साथ नैनो यूरिया-नैनो डीएपी सहित जिंक, आयरन सहित दूसरे उत्पाद टैग के रूप में बिक्री करती है। टैग उत्पाद नहीं लेने की दशा में किसानों को यूरिया-डीएपी आदि उर्वरकों की बिक्री नहीं की जाती। इससे किसानों को मजबूरन आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। सदन में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का मामला उठाते हुए चित्तौडग़ढ़ विधायक चन्द्रभान सिंह चौहान ने कहा कि टैग उत्पाद किसानों पर आर्थिक भार बढ़ा रहे है। अधिकांश उत्पादन मंहगे और घटिया क्वालिटी के होते है। कृषि विभाग के द्वारा उत्पादों पर कोई ट्रायल भी नहीं लगाई गई है। लेकिन, उर्वरक निर्माता कं पनियां किसानों को खरीद के लिए मजबूर किए हुए है। 

यूपी में प्रतिबंध

उन्होंने बताया कि प्रदेश में टैग उत्पादन की बिक्री रोकने के लिए ठोस कानून की जरूरत है। उत्तरप्रदेश सरकार ने जनवरी 2026 से ही उर्वरक निर्माताओं द्वारा दिए जाने वाले टैग उत्पादों की बिक्री को प्रतिबंधित किया हुआ है। कुछ ऐसे ही कदम राज्य सरकार को उठाने की जरूरत है। इस पर कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने किसान हित में आवश्यक कदम उठाने की बात कही। 

600 रूपए तक नुकसान

गौरतलब है कि डीएपी के एक बैग की दर 1350 रूपए तय है। इसके साथ नैनो डीएपी की आधा लीटर की बोतल किसानों को जबरन थमा दी जाती है। इस तरह एक यूरिया बैग की कीमत 1950 रूपए बैठती है। कमोबेश यही स्थिति यूरिया लेने वाले किसानों के साथ है। यूरिया बैग के साथ ही 225 रूपए कीमत की नैनो यूरिया की बोतल टैग के रूप में बिक्री की जाती है। 

रिसर्च में खुल चुकी है पोल

बता दें किसानो के लिए लाभकारी बताकर बाजार में उतारे गए नैनो यूरिया और डीएपी की पोल पंजाब कृषि विश्ववविद्यालय सहित एक दूसरे कृषि संस्थान द्वारा किए गए शोध में खुल चुकी है। शोध में गेहूं, धान की उत्पादकता में कमी आई है। वहीं, अनाज में प्रोटीन की मात्रा में भी नुकसान उठाना पड़ा है। 

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